जीविका दीदियों ने बदली तकदीर: सुई-धागे से लिख रहीं आत्मनिर्भरता की नई कहानी

पटना से सटे मसौढ़ी प्रखंड की महिलाएं आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रही हैं। बिहार सरकार की जीविका योजना से जुड़ी करीब 150 महिलाएं सिलाई केंद्र में काम कर न केवल आंगनबाड़ी बच्चों के लिए यूनिफॉर्म, स्वेटर और बैग तैयार कर रही हैं, बल्कि अपने परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत बना रही हैं।

कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज अपने हुनर के दम पर सम्मान और पहचान दोनों हासिल कर रही हैं। जीविका सिलाई केंद्र ने उन्हें रोजगार का ऐसा मंच दिया है, जिससे वे हर महीने अच्छी आमदनी कर रही हैं।

रानी देवी बताती हैं कि पहले वे पूरी तरह पति की कमाई पर निर्भर थीं, लेकिन अब हर महीने 6 से 7 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। इससे बेटी की पढ़ाई और घर का खर्च खुद संभाल रही हैं। वहीं, शांति देवी कहती हैं कि पति के निधन के बाद जीवन कठिन हो गया था, लेकिन सिलाई केंद्र से जुड़कर उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली।

केंद्र की समन्वयक सुनीता कुमारी के अनुसार, सभी महिलाओं को प्रशिक्षण के साथ सिलाई मशीन उपलब्ध कराई गई है। अब वे हजारों यूनिफॉर्म तैयार कर रही हैं, जिससे उनकी आय और आत्मविश्वास दोनों बढ़े हैं। महिलाएं प्रतिदिन 200 से 300 रुपये तक की कमाई कर रही हैं। हालांकि उन्होंने सरकार से इलेक्ट्रिक सिलाई मशीन और कपड़ा काटने की मशीन उपलब्ध कराने की मांग की है।

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जीविका से जुड़ी रश्मि और सरिता कुमारी का कहना है कि पहले पहचान नहीं थी, लेकिन अब लोग सम्मान की नजर से देखते हैं। अपने हाथ में कमाई आने से आत्मविश्वास भी बढ़ा है।

प्रखंड जीविकोपार्जन पदाधिकारी दिग्विजय नारायण समदर्शी बताते हैं कि महिलाएं सिलाई के साथ बैंकिंग, हिसाब-किताब और मार्केटिंग भी सीख रही हैं। भविष्य में और सिलाई केंद्र खोलने की योजना है।

बिहार सरकार की जीविका योजना ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने का सफल अभियान बन चुकी है। मसौढ़ी की ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि अवसर और आत्मविश्वास मिले तो बदलाव की नई इबारत लिखी जा सकती है।

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