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गाय में भीषण आग: 7 एकड़ के शमीना बाग में 400 पेड़ जलकर राख, मेहनत पर फिरा पानी
बिहार के गया जिले में तापमान बढ़ने के साथ आग लगने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। ताजा मामला कोठी थाना क्षेत्र के देवरिया गांव का है, जहां लगभग 7 एकड़ में फैले मशहूर शमीना बाग में भीषण आग लग गई। इस आग में करीब 400 पेड़ पूरी तरह जलकर नष्ट हो गए, जबकि 200 से अधिक पेड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
यह बगीचा स्थानीय निवासी अली खान उर्फ कैफ़ी का है, जिसमें आम, अमरूद, जामुन, अनार, नींबू समेत 3000 से अधिक फलदार पेड़ लगे थे। रविवार को अचानक बगीचे में आग लग गई। ग्रामीणों ने आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन तेज लपटों के सामने सभी प्रयास नाकाम साबित हुए।
आग लगने के कारणों का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चल पाया है, लेकिन प्राथमिक आशंका शॉर्ट सर्किट की जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि बगीचे के ऊपर से गुजर रहे बिजली के तार से चिंगारी गिरने की वजह से यह हादसा हुआ हो सकता है।
इस बगीचे की कहानी संघर्ष और मेहनत की मिसाल है। करीब 10-12 साल पहले यह जमीन पूरी तरह बंजर थी। अली खान और उनकी पत्नी शमीना खानम ने कठिन परिस्थितियों में दिन-रात मेहनत कर इसे हरा-भरा बनाया। इतना ही नहीं, शमीना खानम ने अपने निजी कॉलेज की प्रिंसिपल की नौकरी छोड़कर बागवानी में पति का साथ दिया।
इससे पहले भी चार साल पहले इसी बगीचे में आग लग चुकी है, जिसमें करीब 500 अमरूद के पौधे नष्ट हुए थे। हालांकि उस समय नुकसान कम था, लेकिन इस बार आग ने आधे से ज्यादा बगीचे को तबाह कर दिया।
पीड़ित अली खान ने इस मामले में थाने में लिखित शिकायत दी है और जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बार-बार आग लगना संदेह पैदा करता है। यह दुर्घटना है या साजिश, इसकी जांच जरूरी है।
बताया जाता है कि इस बगीचे से हर साल 7-8 लाख रुपये की आमदनी होती थी। अब इस हादसे ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को झटका दिया है, बल्कि वर्षों की मेहनत और एक सपने को भी राख में बदल दिया है।
Fitness
कटिहार में स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही: एक एंबुलेंस में 17 लोगों को ठूंसकर लाया, बच्चों की जान खतरे में
बिहार के कटिहार जिल से स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर लापरवाही का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां सदर अस्पताल में एक एंबुलेंस के भीतर 7 कुपोषित बच्चों और उनके 10 परिजनों, यानी कुल 17 लोगों को एक साथ ठूंसकर लाया गया। हालत इतनी खराब थी कि एंबुलेंस में खड़े होने या ठीक से बैठने तक की जगह नहीं थी।
जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत आजमनगर प्रखंड से इन बच्चों को जांच के लिए लाया जा रहा था। नियमों के अनुसार एक एंबुलेंस में अधिकतम दो बच्चों और उनके अभिभावकों को सुरक्षित तरीके से लाने का प्रावधान है, लेकिन यहां सभी नियमों को नजरअंदाज कर दिया गया।
इस दौरान बच्चों और महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। बंद और संकरी जगह में सफर करने के कारण घुटन की स्थिति बनी रही। विशेषज्ञों का कहना है कि कुपोषित बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है, ऐसे में इस तरह की भीड़भाड़ उन्हें संक्रमण के गंभीर खतरे में डाल सकती है। लंबे समय तक तंग हालत में रहने से उनकी सेहत और बिगड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
जब इस मामले पर एंबुलेंस चालक और साथ मौजूद डॉक्टर शकील अहमद से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की। उनका कहना था कि वे केवल अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश का पालन कर रहे थे। डॉक्टर के अनुसार, एंबुलेंस की कमी के कारण सभी को एक साथ लाना पड़ा।
यह घटना सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। एक ओर सरकार कुपोषण खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इस तरह की लापरवाही सामने आ रही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कटिहार के जिलाधिकारी आशुतोष द्विवेदी ने तत्काल जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को 48 घंटे के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है और चेतावनी दी है कि दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।





