समस्तीपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। शहर के बीचों-बीच स्थित एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय वर्षों से झोपड़ीनुमा ढांचे में संचालित हो रहा है, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यह विद्यालय 2006 से चल रहा है, लेकिन आज भी इसकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।
इस स्कूल में दलित परिवारों के करीब 60 बच्चे पढ़ते हैं। दो जर्जर झोपड़ीनुमा कमरों में कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई होती है। गर्मी में बच्चे और शिक्षक तेज धूप व उमस से जूझते हैं, जबकि बरसात में छत टपकने से पढ़ाई बाधित हो जाती है। पीने के पानी के लिए एकमात्र चापाकल है और मिड-डे मील भी कक्षा के एक कोने में तैयार किया जाता है। सबसे बड़ी समस्या शौचालय की है, जिसकी अनुपस्थिति में बच्चों और शिक्षकों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है।
पूर्व प्रधानाध्यापिका चमचम कुमारी ने बताया कि उन्होंने अपने कार्यकाल (2011 से 2025) के दौरान हर साल निजी खर्च से 30-35 हजार रुपये लगाकर स्कूल की मरम्मत करवाई, ताकि किसी तरह पढ़ाई जारी रह सके। वहीं नई शिक्षिका निकिता कुमारी ने कहा कि पोस्टिंग के समय उन्हें लगा था कि शहर का स्कूल बेहतर होगा, लेकिन वास्तविकता देखकर वे हैरान रह गईं।
स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि आसपास 3 किलोमीटर तक कोई अन्य स्कूल नहीं है, जिससे मजबूरी में बच्चों को इसी स्कूल में भेजना पड़ता है। हालांकि विभाग द्वारा इस विद्यालय को दूसरे स्कूल में मर्ज करने की बात कही जा रही है, लेकिन दूरी और सुरक्षा को लेकर ग्रामीण चिंतित हैं।
प्रधानाध्यापक विश्वजीत झा के अनुसार, स्कूल शिक्षा विभाग के कार्यालय के पास ही है, फिर भी इसकी हालत पर किसी अधिकारी का ध्यान नहीं गया। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी ने भूमि की कमी को समस्या बताते हुए जल्द ही इस विद्यालय को दूसरे स्कूल में मर्ज करने की बात कही है।
