पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर जनप्रतिनिधियों की शैक्षणिक योग्यता को लेकर बहस तेज हो गई है. भारतीय लोकतंत्र में हमेशा ‘प्रतिनिधित्व’ को ‘डिग्री’ से ऊपर रखा गया, ताकि समाज का हर वर्ग नीति निर्माण में भाग ले सके. लेकिन मौजूदा हालात ने इस सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं. आज के जटिल प्रशासनिक ढांचे और नीतियों को समझने के लिए क्या शिक्षा जरूरी होनी चाहिए—यही मुख्य सवाल बन गया है।

आंकड़ों के अनुसार, बिहार विधानसभा के करीब 50% विधायक ग्रेजुएट नहीं हैं. इनमें 18-20% ऐसे हैं जिन्होंने 10वीं से कम पढ़ाई की है, जबकि 30-35% केवल मैट्रिक या इंटर तक शिक्षित हैं. वहीं दूसरी ओर, कुछ नेता उच्च शिक्षित भी हैं—करीब 20 विधायक पीएचडी धारक हैं और कई के पास प्रोफेशनल डिग्री है. इस असमानता ने बहस को और तेज कर दिया है।

राजनीति में शिक्षा को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है. चुनावी रणनीतिकार लगातार नेताओं की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं. वहीं जैसे नेता इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आते हैं, जबकि कई बड़े नेता सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद शीर्ष पदों तक पहुंचे हैं. और की शिक्षा भी अक्सर चर्चा में रहती है।

इस बहस के बीच ‘कर्पूरी डिवीजन’ का जिक्र भी अहम है. जननायक ने 1970 के दशक में मैट्रिक में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर दी थी. इसके तहत अंग्रेजी में फेल होने पर भी कुल अंक के आधार पर छात्रों को पास किया जाता था, जिससे ग्रामीण और वंचित छात्रों को राहत मिली।

विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ मानते हैं कि शिक्षा से नीति निर्माण बेहतर होता है, जबकि अन्य का कहना है कि सामाजिक समझ और अनुभव ज्यादा जरूरी है. दार्शनिक ने जनता की इच्छा को सर्वोपरि माना, वहीं ने शिक्षित शासक की वकालत की थी।

कुल मिलाकर, सवाल यही है—क्या अब समय आ गया है कि जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय की जाए, या फिर लोकतंत्र में जनता का फैसला ही अंतिम मानदंड बना रहे?

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