मधुश्रावणी में ‘टेमी दागने’ की अनोखी रस्म, पति की लंबी उम्र के लिए नवविवाहिताओं की अग्निपरीक्षा

दरभंगा: मिथिलांचल की लोक संस्कृति में मधुश्रावणी पर्व का विशेष महत्व है। सावन में मनाया जाने वाला यह 13 दिवसीय पर्व नवविवाहिताओं के लिए आस्था, परंपरा और वैवाहिक जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। पर्व के दौरान भगवान शिव, माता पार्वती और नाग देवता की पूजा की जाती है। इस बार मधुश्रावणी का समापन 15 अगस्त को पारंपरिक ‘टेमी दागने’ की रस्म के साथ होगा।

मान्यता है कि मधुश्रावणी के अंतिम दिन नवविवाहिताओं के घुटनों पर टेमी दागने की रस्म निभाई जाती है। पारंपरिक रूप से कपड़े की जलती बाती से पान के पत्ते में किए गए छोटे छेद के जरिए दोनों घुटनों और पैरों पर यह रस्म पूरी की जाती है। लोकविश्वास के अनुसार इससे पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन की मजबूती जुड़ी है। हालांकि, अब कई स्थानों पर चोट और दर्द से बचने के लिए प्रतीकात्मक रूप से दीपक को घुटने के पास लाकर रस्म पूरी की जाती है।

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मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं 13 दिनों तक बिना नमक का भोजन करती हैं। मुख्य रूप से अरवा चावल का सेवन किया जाता है और रात में भोजन नहीं किया जाता। महिलाएं अपनी सखियों के साथ फूल-पत्ते चुनकर लाती हैं और कोहबर घर में पूजा-अर्चना करती हैं। विषहरा, शिव-पार्वती और नाग देवता की पूजा के साथ बिहुला, गौरी तपस्या और शिव-विवाह जैसी धार्मिक कथाओं का वाचन भी होता है।

कथावाचिका जानकी मिश्रा के मुताबिक, यह मिथिला का प्रमुख पर्व है, जिसे नवविवाहिताएं पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मनाती हैं।

पर्व के अंतिम दिन पति द्वारा नवविवाहिता को दोबारा सिंदूरदान करने की परंपरा भी है। इसके बाद टेमी दागने की रस्म होती है। यदि पति बाहर रहते हैं तो वे विशेष रूप से शामिल होने का प्रयास करते हैं और उनके नहीं पहुंच पाने पर विधकरी यह रस्म निभाती हैं।

मधुश्रावणी सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की लोक संस्कृति, प्रकृति और पारिवारिक परंपराओं को जोड़ने वाला उत्सव भी है। लोकगीत, हंसी-ठिठोली और सामूहिक पूजा के बीच यह परंपरा आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।

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