बिहार की राजनीति सिर्फ जातीय और सामाजिक समीकरणों तक सीमित नहीं है। यहां शिक्षा जगत से जुड़े प्रोफेसरों की राजनीति भी सत्ता और नीतियों पर खास असर डालती है। राज्य में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था होने के कारण शिक्षाविदों की विधान परिषद में लगातार भागीदारी बनी रहती है। इन क्षेत्रों से चुने गए प्रतिनिधि शिक्षा, विश्वविद्यालयों और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को सदन में मजबूती से उठाते हैं।
बिहार के नियमों के अनुसार कॉलेज और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर चुनाव लड़ सकते हैं। जनप्रतिनिधि बनने पर उन्हें वैधानिक अवकाश मिलता है और कार्यकाल समाप्त होने के बाद वे दोबारा अपनी सेवा में लौट सकते हैं। हालांकि वेतन केवल एक ही स्थान से लेने का प्रावधान है।
भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी ए.एन. कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। वे पांच बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं तथा पायलट भी हैं। भाजपा के वरिष्ठ एमएलसी नवल किशोर यादव मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं और तीन दशक से शिक्षक हितों की आवाज उठा रहे हैं।
राजद के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. चंद्रशेखर प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं, जबकि डॉ. रामानंद यादव रसायन विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर रहे हैं। जदयू के डॉ. संजीव कुमार सिंह कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार चार बार एमएलसी चुने गए और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं।
बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी का उदाहरण सबसे अलग है। वे शिक्षा मंत्री रहते हुए प्रोफेसर बने और आज ए.एन. कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक हैं। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह, राजद के राज्यसभा सांसद प्रो. मनोज झा, भाजपा के डॉ. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, जदयू के रामबचन राय और प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव भी शिक्षा जगत से राजनीति में पहुंचे प्रमुख चेहरे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में प्रोफेसरों की राजनीति का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और शिक्षकों की समस्याओं को नीति निर्माण तक पहुंचाना है। उम्मीद की जाती है कि शिक्षा जगत का अनुभव राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पलायन जैसी चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।






