पटना इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और दोपहर में बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। जिला प्रशासन ने लू से बचाव को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं और लोगों से पशु-पक्षियों के लिए पानी रखने की अपील की है। लेकिन शहर के उन मेहनतकश लोगों के लिए राहत की कोई ठोस व्यवस्था नजर नहीं आ रही, जो रोज सड़कों पर रिक्शा, ठेला और ऑटो चलाकर अपनी जीविका चलाते हैं।

प्रशासन का दावा है कि 17 नगर निकायों और 26 अंचलों में 396 स्थानों पर प्याऊ और मुफ्त पेयजल की व्यवस्था की गई है, साथ ही 15 आश्रय स्थल भी चलाए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है। शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर कहीं भी प्याऊ नजर नहीं आ रहे। पहले नगर निगम की ओर से मिट्टी के घड़ों में ठंडा पानी, गुड़ और चना उपलब्ध कराया जाता था, जिससे राहगीरों और मजदूरों को राहत मिलती थी।

रिक्शा चालक रंजीत कुमार बताते हैं कि पिछले साल इनकम टैक्स चौराहे पर हमेशा ठंडा पानी मिलता था, लेकिन इस बार ऐसी कोई सुविधा नहीं है। वहीं राजेंद्र महतो कहते हैं कि अब उन्हें प्यास लगने पर आसपास के घरों या दफ्तरों में पानी मांगना पड़ता है, जो अक्सर गर्म होता है।

पटना जंक्शन के पास काम करने वाले उपेंद्र राय के अनुसार, वे घर से पानी लेकर निकलते हैं, लेकिन दोपहर तक वह गर्म हो जाता है। मजबूरी में उन्हें कहीं भी उपलब्ध पानी पीना पड़ता है, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो। वहीं बलदेव शाह कहते हैं कि अब उन्हें सार्वजनिक शौचालय के नल से पानी लेना पड़ता है या पैसे देकर पानी खरीदना पड़ता है, जो उनके लिए महंगा पड़ता है।

कुल मिलाकर, इस भीषण गर्मी में शहर के मेहनतकश लोगों को सिर्फ एक घूंट ठंडा और साफ पानी की जरूरत है। प्रशासन के दावों के बीच जमीनी सच्चाई सवाल खड़े कर रही है।

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