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1857 की क्रांति के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह को उनकी अदम्य वीरता के लिए जाना जाता है। ‘बिहार का सिंह’ कहलाने वाले इस योद्धा की एक ऐसी भावनात्मक कहानी भी है, जो कम ही लोगों को पता है। विजय दिवस के मौके पर उनकी यही अनसुनी प्रेम कहानी फिर चर्चा में है।

 

23 अप्रैल 1858 का दिन इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जब वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को हराकर जगदीशपुर पर दोबारा कब्जा किया। इसी जीत की याद में हर साल विजय दिवस मनाया जाता है। 80 साल की उम्र में भी उनका साहस युवाओं को मात देता था। उन्होंने न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका और 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया।

 

लेकिन इस वीरता के पीछे एक प्रेरणा भी थी—उनका प्रेम। आरा की मशहूर तवायफ धरमन बाई से उनका गहरा संबंध बना। धीरे-धीरे यह रिश्ता प्रेम में बदल गया और समाज की परवाह किए बिना उन्होंने 43 वर्ष की उम्र में उनसे विवाह किया। उनका उद्देश्य था धरमन बाई को सम्मान और पहचान दिलाना।

 

कहा जाता है कि धरमन बाई ने ही उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। यही वजह थी कि 80 वर्ष की उम्र में भी उनके भीतर अद्भुत जोश था। धरमन बाई सिर्फ उनकी पत्नी ही नहीं, बल्कि युद्ध में उनकी साथी भी थीं। वे रणभूमि में उनके साथ खड़ी रहीं और हर परिस्थिति में उनका हौसला बढ़ाती रहीं।

 

वीर कुंवर सिंह ने गुरिल्ला युद्धनीति अपनाकर अंग्रेजों में दहशत फैला दी। उनकी लड़ाई हिंदू-मुस्लिम एकता का भी प्रतीक बनी। हालांकि इस संघर्ष में उन्होंने अपने पोते और पत्नी को खो दिया, लेकिन उनका साहस कभी नहीं टूटा।

 

गंगा पार करते समय घायल होने के बाद उन्होंने अपनी ही तलवार से अपनी बांह काटकर बलिदान की मिसाल पेश की। 26 अप्रैल 1858 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी वीरता और प्रेम की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

 

आज भी आरा और जगदीशपुर सहित पूरे देश में विजय दिवस पूरे सम्मान के साथ मनाया जाता है, जहां लोग इस महान योद्धा को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके आदर्शों को याद करते हैं।

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