पश्चिमी चंपारण के बगहा क्षेत्र के नौरंगिया गांव में आधुनिकता के इस दौर में भी एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा जीवित है। हर साल के दिन यहां के सभी ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ गांव छोड़कर जंगल चले जाते हैं, जिससे पूरा गांव करीब 12 घंटे तक पूरी तरह खाली रहता है।
ग्रामीणों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत वर्षों पहले हुई थी जब गांव में आगजनी और महामारी जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही थीं। तब बाबा परमहंस ने देवी मां की कठोर साधना की। मान्यता है कि देवी ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया कि गांव को एक दिन के लिए खाली किया जाए, तभी इन संकटों से मुक्ति मिलेगी। तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।
इस दिन सुबह-सुबह सभी ग्रामीण वाल्मीकि टाइगर स्थित भजनी कुट्टी स्थान पहुंचते हैं। वहां मां दुर्गा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, प्रसाद चढ़ाया जाता है और फिर सामूहिक भोजन का आयोजन होता है। जंगल में पूरे दिन मेले जैसा माहौल रहता है, जहां लोग मिल-जुलकर खाना बनाते हैं और साथ समय बिताते हैं।
सबसे खास बात यह है कि इस दौरान गांव के सभी घर खुले रहते हैं, किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता, फिर भी चोरी जैसी कोई घटना सामने नहीं आती। यह परंपरा न केवल आस्था बल्कि आपसी विश्वास और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।
गांव के महंत देवनारायण पुरी बताते हैं कि यह परंपरा कब शुरू हुई, इसका सटीक समय किसी को नहीं पता, लेकिन उनके पूर्वज भी इसी तरह इसे निभाते आए हैं। वहीं मुखिया सुनील महतो का कहना है कि यह करीब 100 साल पुरानी परंपरा है और गांव की आस्था से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि इस पूजा के कारण गांव में शांति और सुरक्षा बनी रहती है।
ग्रामीणों का विश्वास है कि विज्ञान या आधुनिकता इस परंपरा को प्रभावित नहीं कर सकती, क्योंकि यह उनकी संस्कृति और विश्वास का अभिन्न हिस्सा है।
