बिहार के गयाजी स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB) के शोधकर्ता भीषण गर्मी में मधुमक्खी पालन को संभव बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। जहां सामान्यतः मधुमक्खियों के लिए 34.6 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान अनुकूल माना जाता है, वहीं 45 डिग्री तापमान उनके लिए जानलेवा हो सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसी तकनीकें विकसित कर रहे हैं, जिससे मधुमक्खियां गर्मी में भी जीवित रहें और शहद उत्पादन जारी रहे।
मई-जून की 40 से 46 डिग्री गर्मी में मधुमक्खी पालकों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। अधिक तापमान में मधुमक्खियां या तो मर जाती हैं या पलायन कर जाती हैं, जिससे शहद उत्पादन में 25-30% तक गिरावट आती है। इस समस्या को देखते हुए CUSB के पंचानपुर परिसर में शोध और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
प्रोफेसर डॉ. हेमंत कुमार के अनुसार, इस शोध में मधुमक्खियों के बेहतर प्रबंधन पर खास ध्यान दिया जा रहा है। बक्सों को उत्तर-पूर्व दिशा में रखना, 50-75% शेड नेट का उपयोग, उचित वेंटिलेशन और आर्द्रता संतुलन जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। इससे बक्सों के अंदर तापमान नियंत्रित रहता है और लार्वा सुरक्षित रहते हैं।
गर्मी में पानी का प्रबंधन भी बेहद जरूरी है। मधुमक्खियों को रोजाना 200-500 मिलीलीटर पानी की जरूरत होती है। इसके लिए उथले बर्तन में कंकड़ डालकर पानी रखा जाता है, ताकि मधुमक्खियां सुरक्षित तरीके से पानी ले सकें। कुछ स्थानों पर घड़े से टपकते पानी की व्यवस्था भी की गई है।
छात्रों को भी इस प्रोजेक्ट के तहत व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उनका मानना है कि वैज्ञानिक तरीकों से मधुमक्खी पालन करने पर कम लागत में अधिक मुनाफा संभव है। बाजार में शहद की कीमत 600-800 रुपये प्रति किलो तक है, जिससे किसानों की आय बढ़ सकती है।
सूरजमुखी जैसे फूलों से मिलने वाला शहद खासतौर पर लाभकारी होता है, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट और औषधीय गुण होते हैं। सही तकनीक और प्रबंधन से बिहार में मधुमक्खी पालन एक लाभकारी व्यवसाय बन सकता है।
