गया: बिहार के गया जिले में पांच बेटियों ने रूढ़िवादी परंपराओं को पीछे छोड़कर अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट पहुंचकर अंतिम संस्कार भी किया। बेटियों के इस कदम की इलाके में खूब चर्चा हो रही है। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि बेटियां भी परिवार की हर जिम्मेदारी पूरी करने में सक्षम हैं।
मामला गुरुआ प्रखंड की पहरा पंचायत के बैकटपुर गांव का है। गांव के चर्चित किसान सीता यादव का रविवार शाम अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद निधन हो गया। उनके कोई बेटा नहीं था। सीता यादव की पांच बेटियां ममता कुमारी, रजांती देवी, चुन्नी देवी, मुन्नी देवी और सुमंती देवी हैं।
पिता की मौत के बाद घर में मातम छा गया। इसी बीच यह सवाल भी सामने आया कि अब पिता की अर्थी को कंधा कौन देगा। समाज में आमतौर पर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी बेटों या पुरुषों द्वारा निभाने की परंपरा रही है। लेकिन पांचों बेटियों ने इस सोच से अलग फैसला लिया और खुद पिता की अंतिम यात्रा की जिम्मेदारी संभालने का निर्णय किया।
पांचों बेटियां पिता की अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट पहुंचीं। वहां उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अपने पिता का अंतिम संस्कार किया। बेटियों को अर्थी को कंधा देते और अंतिम संस्कार करते देखकर मौके पर मौजूद कई लोग भावुक हो गए।
बेटियों के इस साहसिक कदम की स्थानीय लोगों ने सराहना की। लोगों का कहना है कि बेटियां किसी भी जिम्मेदारी में बेटों से कम नहीं हैं।
बसपा नेता राघवेंद्र नारायण यादव ने भी बेटियों की सराहना करते हुए कहा कि सामाजिक व्यवस्था में बेटे और बेटियों के बीच भेदभाव किया जाता है। लेकिन इन बेटियों ने साबित कर दिया कि वे परिवार की किसी भी जिम्मेदारी को निभाने में पीछे नहीं हैं। उन्होंने समाज के सामने एक मिसाल कायम की है।






