पटना: बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक आलोक राज की पहचान कभी एक सख्त और जांबाज पुलिस अधिकारी के रूप में होती थी। नक्सल प्रभावित इलाकों में कठिन ऑपरेशन की कमान संभालने वाले आलोक राज को चार बार डीजी सीआरपीएफ के प्रशंसा-पत्र और राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक से सम्मानित किया जा चुका है। 37 वर्षों की पुलिस सेवा के बाद अब उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया है। वर्दी के बाद अब वह संगीत और भक्ति के जरिए लोगों तक पहुंच रहे हैं।
आलोक राज बताते हैं कि संगीत उनके लिए ईश्वर का आशीर्वाद है। वह आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे हैं। जनवरी 2011 में उन्होंने संगीत गुरु अशोक कुमार प्रसाद से संगीत सीखना शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने कई भजन और संगीत एल्बम रिकॉर्ड किए। टी-सीरीज के जरिए उनका ‘साईं अर्चना’ भजन एल्बम जारी हुआ। उन्होंने गोपालदास नीरज की रचनाओं, दुष्यंत कुमार की गजलों और कबीर के भजनों को भी अपनी आवाज दी है।
सावन के मौके पर उन्होंने भगवान भोलेनाथ को समर्पित भोजपुरी कांवड़ गीत भी रिलीज किया है। उनका कहना है कि भोजपुरी सिर्फ किसी एक इलाके की भाषा नहीं, बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक पहचान है। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उन्होंने भगवान श्रीराम पर भी विशेष भजन रिकॉर्ड किया था।
अपने पुलिस करियर को याद करते हुए आलोक राज ने कहा कि सीआरपीएफ में बिताए सात साल उनके जीवन का ‘गोल्डन चैप्टर’ रहे। नंदीग्राम समेत कई चुनौतीपूर्ण अभियानों में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
युवाओं और पुलिसकर्मियों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि तनाव से बचने के लिए हर व्यक्ति को कोई सकारात्मक हॉबी जरूर रखनी चाहिए। अच्छा साहित्य पढ़ना, संगीत सुनना या कोई कला सीखना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। प्रतियोगी छात्रों को उन्होंने स्पष्ट लक्ष्य, अनुशासित दिनचर्या, लगातार अभ्यास और बेहतर टाइम मैनेजमेंट को सफलता की कुंजी बताया।
आलोक राज की कहानी बताती है कि इंसान की पहचान केवल उसके पेशे से नहीं होती। सीखने की इच्छा और अपनी प्रतिभा को निखारने का जुनून जिंदगी की दूसरी पारी को भी बेहद खास बना सकता है।





