गया में बचाया जा रहा दुर्लभ ‘नागकेसर’ का वृक्ष, औषधीय और धार्मिक महत्व से जुड़ी अनोखी पहल

गया जिले के मोहड़ा प्रखंड के जेठियन गांव में एक दुर्लभ और विलुप्तप्राय औषधीय पौधे नागकेसर (Mesua ferrea) के संरक्षण की अनूठी पहल की जा रही है। गांव के निवासी गोपाल शरण इस बहुमूल्य वृक्ष को बचाने के लिए अपने औषधीय उद्यान में इसकी खेती कर रहे हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल की सरकारी नर्सरी से पौधे लाकर उन्हें संरक्षित किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस दुर्लभ प्रजाति को पहचान सकें और इसके महत्व को समझ सकें।

नागकेसर अपनी अनोखी बनावट के कारण भी चर्चा में रहता है। इसके फूलों का आकार फन फैलाए नाग जैसा दिखाई देता है, जिससे इसका नाम नागकेसर पड़ा। लोकमान्यताओं के अनुसार संकट के समय सांप इस वृक्ष के पास शरण लेते हैं। हालांकि इस विश्वास का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन भारतीय परंपरा और धार्मिक आस्था में इस वृक्ष का विशेष स्थान माना जाता है।

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गोपाल शरण बताते हैं कि उन्होंने वर्षों तक इस पौधे पर अध्ययन किया और कई प्राचीन ग्रंथों तथा लोककथाओं में इसका उल्लेख पाया। तांत्रिक साधना, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में भी नागकेसर के फूलों का उपयोग शुभ माना जाता है। नवंबर के महीने में खिलने वाले इसके गहरे गुलाबी फूल बेहद आकर्षक होते हैं और पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में इन्हें देखने लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं।

होम्योपैथ एवं औषधीय पौधों के जानकार डॉ. संजय प्रसाद के अनुसार नागकेसर के फूल, बीज और छाल का उपयोग आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से खांसी, जुकाम, सूजन, त्वचा रोग, पेट संबंधी समस्याओं और अन्य कई रोगों के उपचार में किया जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटीबैक्टीरियल और सूजनरोधी गुण पाए जाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सेवन केवल चिकित्सकीय सलाह पर ही करना चाहिए।

गोपाल शरण के लगाए गए पौधे अभी लगभग दो वर्ष के हैं। सामान्यतः सात वर्ष बाद इनमें फूल और फल आने लगते हैं तथा यह वृक्ष 18 से 30 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। उनका मानना है कि यदि लोग निजी स्तर पर भी ऐसे दुर्लभ पौधों के संरक्षण के लिए आगे आएं, तो कई विलुप्तप्राय वनस्पतियों को बचाया जा सकता है।

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