110 साल पुरानी वैज्ञानिक धरोहर बदहाल, एलएस कॉलेज का ऐतिहासिक तारामंडल पुनर्जीवन की राह देख रहा

मुजफ्फरपुर: बिहार के प्रतिष्ठित लंगट सिंह (एलएस) कॉलेज का 110 साल से अधिक पुराना तारामंडल और खगोलीय वेधशाला आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार है। कभी विज्ञान शिक्षा और खगोलीय अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहा यह परिसर अब जर्जर भवन, बंद उपकरणों और प्रशासनिक उदासीनता की कहानी बयां कर रहा है।

एलएस कॉलेज की खगोलीय वेधशाला की स्थापना वर्ष 1916 में हुई थी। इसके बाद 1958 में यहां आधुनिक तारामंडल बनाया गया, जिसमें जर्मनी की कंपनी Carl Zeiss का ZEISS ZKP1 प्रोजेक्शन सिस्टम, विशाल गुंबद, खगोलीय घड़ी और अन्य आधुनिक उपकरण लगाए गए थे। उस दौर में यह पूर्वी भारत के चुनिंदा वैज्ञानिक संस्थानों में शामिल था।

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1985 से कॉलेज में कार्यरत प्रोफेसर वृजनंद कुमार पहली बार तारामंडल पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह केवल एलएस कॉलेज ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक धरोहर है। उनके अनुसार, यह उस समय का प्रतीक है जब शिक्षा संस्थानों में विज्ञान और खगोलीय अध्ययन को विशेष महत्व दिया जाता था।

1970 के दशक तक यहां नियमित रूप से छात्र खगोलीय अध्ययन करते थे, लेकिन रखरखाव की कमी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण धीरे-धीरे यह पूरी तरह बंद हो गया। आज इसकी सीटें टूट चुकी हैं, गुंबद जर्जर हो चुका है, प्रोजेक्शन सिस्टम बंद पड़ा है और कई दुर्लभ उपकरण चोरी या खराब हो चुके हैं।

कॉलेज के कर्मचारी रणविजय सिंह ने बताया कि 1990 के दशक से ही यह तारामंडल बंद है। इसे दोबारा शुरू कराने के लिए कई बार सरकार को पत्र भेजे गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

अगस्त 2022 में इस वेधशाला को UNESCO की महत्वपूर्ण लुप्तप्राय विरासत वेधशालाओं की सूची में शामिल किया गया था। इससे संरक्षण की उम्मीद जगी, लेकिन चार साल बाद भी हालात नहीं बदले। ऐसे में बिहार की इस ऐतिहासिक वैज्ञानिक धरोहर के संरक्षण और पुनर्जीवन की मांग एक बार फिर तेज हो गई है।

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