पटना: हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर देशभर में हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास और उसके बदलते स्वरूप को याद किया जा रहा है। 30 मई 1826 को हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ के प्रकाशन के साथ शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता आज डिजिटल और सोशल मीडिया के युग में नए आयाम स्थापित कर रही है।
बिहार की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास भी बेहद समृद्ध रहा है। बिहार का पहला हिंदी समाचार पत्र ‘बिहार बंधु’ वर्ष 1872 में कोलकाता से प्रकाशित हुआ था। वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र बताते हैं कि उनका परिवार छह पीढ़ियों से पत्रकारिता से जुड़ा रहा है। उनके अनुसार, बिहार बंधु का संचालन और अंतिम प्रकाशन भी उनके परिवार के घर से हुआ था। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज पंडित रामलाल मिश्र को बिहार के प्रथम पत्रकारों में गिना जाता है और उन्होंने पत्रकारिता के साथ शिक्षा एवं सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत प्रत्यूष के अनुसार, हिंदी पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रीयता, जनजागरण और सामाजिक बदलाव की कहानी है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी पत्रकारिता ने लोगों में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने और अंग्रेजी शासन के अत्याचारों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज हिंदी पत्रकारिता अखबारों से आगे बढ़कर टीवी, वेबसाइट और सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान स्वरूप पत्रकारों के लंबे संघर्ष और त्याग का परिणाम है। कभी खबरों को पाठकों तक पहुंचने में पांच से सात दिन लगते थे, जबकि आज डिजिटल माध्यमों से सूचना कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच जाती है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत जनमत तैयार करना है।
वहीं वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल ने बताया कि पत्रकारिता पहले एक मिशन थी, जो अब एक पेशेवर करियर का रूप ले चुकी है। तकनीक के विकास ने पत्रकारिता को पूरी तरह बदल दिया है। हाथ से कंपोजिंग, टेलीप्रिंटर और फैक्स से होते हुए आज पत्रकारिता डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता समाज और सरकार के बीच एक मजबूत सेतु का काम करती है और लोकतंत्र को सशक्त बनाने में इसकी भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रहेगी।