गया के कई युवक मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और मिसाइल हमलों के डर से भारत लौट आए, लेकिन यहां आकर उन्हें बेरोजगारी की कठोर सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है। कतर से लौटे चोन्हा रामपुर के जीशान खान बताते हैं कि वहां हालात बेहद खतरनाक हो गए थे। उनके मोबाइल पर मिसाइल अटैक का अलर्ट और सायरन बजता था, जिससे परिवार दहशत में रहता था। इसी डर के कारण वह 16 मार्च को भारत लौट आए, लेकिन अब उन्हें लगता है कि यह फैसला उनके करियर के लिए भारी पड़ सकता है।

जीशान कतर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और करीब डेढ़ लाख रुपये महीना कमाते थे। अब उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर 3 मई तक उन्होंने नौकरी ज्वाइन नहीं की, तो उनकी नौकरी चली जाएगी। परिवार सुरक्षा के कारण उन्हें वापस जाने से रोक रहा है, लेकिन आर्थिक दबाव उन्हें फिर विदेश लौटने के लिए मजबूर कर रहा है।

इसी तरह शमशाबाद के साजिद खान, जो सऊदी अरब में ड्राइवर थे, भी लौटने के बाद बेरोजगार हो गए हैं। उन्होंने बताया कि कई बार टिकट कैंसिल होने के बाद वे किसी तरह भारत लौटे, लेकिन अब यहां कोई आय का साधन नहीं है। उनका कहना है कि “वहां जान का खतरा था, लेकिन कमाई तो थी, यहां जीवन ही एक संघर्ष बन गया है।”

गया के कई गांव जैसे शमशाबाद, चोन्हा रामपुर और सुपाई की अर्थव्यवस्था खाड़ी देशों में काम करने वाले मजदूरों पर निर्भर है। अब जब ये युवक लौट आए हैं, तो पूरे गांव पर आर्थिक संकट गहराने लगा है। घर चलाना मुश्किल हो रहा है और बचत खत्म होने लगी है।

लौटे हुए युवाओं की मांग है कि सरकार उनके अनुभव के अनुसार देश में रोजगार के अवसर पैदा करे। उनका कहना है कि अगर भारत में ही अच्छी नौकरी मिले, तो कोई भी अपनी जान जोखिम में डालकर विदेश नहीं जाएगा। फिलहाल ये युवक दो कठिन विकल्पों के बीच फंसे हैं—या तो खतरे के बीच वापस खाड़ी लौटें या यहां बेरोजगारी झेलें।

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