पटना: फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद जब बिहार में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, तब नीतीश कुमार‘न्याय यात्रा’ने निकालकर राजनीतिक माहौल बदल दिया था। उसी साल नवंबर में हुए चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला और वे मुख्यमंत्री बने। करीब 20 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद अप्रैल 2026 में उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा का रास्ता चुना। अब उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनके बेटे की एंट्री हो चुकी है।
निशांत अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत 3 मई से ‘बिहार दौरे’ के जरिए करेंगे, जिसकी शुरुआत पश्चिमी चंपारण से होगी। यह वही जगह है जहां से नीतीश कुमार अपनी कई यात्राएं शुरू करते रहे हैं। इस दौरे को जेडीयू के लिए एक बड़े राजनीतिक लॉन्च के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा, युवा विधायक और संगठन के कई नेता इस यात्रा में उनके साथ रहेंगे।
यात्रा के दौरान निशांत पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे, उनका फीडबैक लेंगे और संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर काम करेंगे। साथ ही, वे जनता के बीच जाकर पिछले 20 वर्षों में हुए विकास कार्यों को सामने रखेंगे और भरोसा जीतने की कोशिश करेंगे। जेडीयू का मानना है कि यह दौरा निशांत को बिहार की जमीनी हकीकत समझने में मदद करेगा।
हालांकि, उनकी तुलना पहले से सक्रिय नेताओं, खासकर से की जा रही है। आरजेडी का कहना है कि अनुभव के मामले में दोनों के बीच बड़ा अंतर है, जबकि जेडीयू इसे एक नई शुरुआत के रूप में पेश कर रही है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह दौरा निशांत के लिए सीखने और खुद को स्थापित करने का पहला कदम है। चंपारण, जिसे की कर्मभूमि माना जाता है, वहीं से शुरुआत कर वे एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में बिहार की राजनीति में ‘नेता पुत्रों’ के बीच मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना है।
