बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद राज्य की आर्थिक स्थिति और चुनावी वादों का दबाव उनकी अग्नि परीक्षा ले सकता है।
दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री की सरकार ने 2026-27 के लिए 3.47 लाख करोड़ से अधिक का बजट बनाया था। लेकिन चुनावी वादों जैसे 125 यूनिट मुफ्त बिजली (लगभग 19,000 करोड़ सालाना खर्च), महिलाओं को आर्थिक सहायता (15,000 करोड़ से अधिक) और सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ोतरी ने सरकारी खजाने पर भारी दबाव डाला है। अब तक करीब 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ चुका है, जो आगे और बढ़ सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञ भोलानाथ के अनुसार, ये वादे अब सम्राट चौधरी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। पेंशन और वेतन के भुगतान में देरी देखने को मिल रही है। वहीं, tejasvi Yadav ने भी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि कर्मचारियों के साथ उनका खुद का वेतन भी समय पर नहीं मिला।
आर्थिक मोर्चे पर चिंता जताते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार का कर्ज लगातार बढ़ रहा है। सरकार की आय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ऋण चुकाने में जा रहा है। ऐसे में राजस्व बढ़ाने और केंद्र से मदद लेने की जरूरत होगी।
हालांकि अर्थशास्त्री मानते हैं कि डबल इंजन सरकार होने से केंद्र का सहयोग मिल सकता है, जिससे विकास योजनाओं को गति मिलेगी और निवेश बढ़ेगा। रोजगार सृजन और पलायन रोकना भी सरकार की प्राथमिकता में है, क्योंकि चुनाव में एक करोड़ नौकरियों का वादा किया गया था।
वहीं विपक्ष कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमलावर है। राजद नेता ने राज्य में बढ़ते अपराधों पर सवाल उठाए हैं। हालांकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सख्त रुख अपनाते हुए अपराधियों को चेतावनी दे चुके हैं कि या तो वे बिहार छोड़ दें या जेल जाने के लिए तैयार रहें।
कुल मिलाकर, आर्थिक दबाव, कानून-व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दे सम्राट सरकार के लिए बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं।
