भागलपुर/सबौर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी (ISA), बीएयू सबौर चैप्टर के तत्वावधान में ‘अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस’ के अवसर पर एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य विषय “विकसित भारत@2047 के लिए सस्य विज्ञान की पुनर्कल्पना” रहा। इसमें विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों, वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों और स्नातकोत्तर छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम में भविष्य की कृषि को टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल, संसाधन-कुशल और तकनीक आधारित बनाने को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यशाला के अध्यक्षीय संबोधन में निदेशक अनुसंधान एवं ISA बीएयू सबौर चैप्टर के अध्यक्ष डॉ. ए.के. सिंह ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि ऐसी सस्य तकनीकों के विकास की जरूरत है, जिससे उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ मृदा, जल और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कृषि क्षेत्र में नवाचार और तकनीकी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
डीन पीजीएस एवं ISA बीएयू सबौर चैप्टर के सचिव डॉ. संजय कुमार ने उच्च शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया। उन्होंने जलवायु-स्मार्ट सस्य विज्ञान, सटीक कृषि और डिजिटल कृषि तकनीकों में दक्षता को भविष्य के कृषि वैज्ञानिकों के लिए आवश्यक बताया।
वहीं, निदेशक प्रशासन एवं ISA बीएयू सबौर चैप्टर के उपाध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार ने अनुसंधान और नवाचार को विश्वविद्यालय स्तर पर हरसंभव सहयोग देने की बात कही। उन्होंने प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी कृषि प्रसार तंत्र मजबूत करने पर बल दिया।
कार्यशाला में मृदा स्वास्थ्य, जलवायु अनुकूलन, संसाधन उपयोग दक्षता, ड्रोन एवं आधुनिक कृषि तकनीक, डिजिटल और सटीक कृषि, फसल विविधीकरण तथा कृषि नवाचार जैसे विषयों पर तकनीकी चर्चा हुई। वक्ताओं ने बदलते जलवायु परिदृश्य और बढ़ती खाद्य मांग के बीच किसान-केंद्रित एवं तकनीक-सक्षम कृषि व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता रेखांकित की। कार्यक्रम के अंत में डॉ. एस. आचार्य ने सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।






