भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में अनुसंधान निदेशालय एवं कीट विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “फसलों में सूत्रकृमियों से जुड़ी समस्याएं एवं उनके नवोन्मुखी समेकित प्रबंधन” विषय पर एक दिवसीय ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य फसलों में सूत्रकृमियों यानी नेमाटोड्स से होने वाले नुकसान, बदलती कृषि परिस्थितियों में उनकी बढ़ती समस्या तथा प्रभावी प्रबंधन उपायों पर विशेषज्ञों और विद्यार्थियों के बीच विचार-विमर्श करना था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के निदेशक अनुसंधान डॉ. ए.के. सिंह ने की। मुख्य वक्ता के रूप में राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर से पहुंचीं डॉ. निशि केशरी ने कृषि में सूत्रकृमियों के महत्व और इनके कारण खाद्यान्न एवं उद्यानिकी फसलों में होने वाले नुकसान पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने सूत्रकृमियों के नियंत्रण के लिए नवोन्मुखी एवं समेकित प्रबंधन तकनीकों पर भी चर्चा की।
डॉ. ए.के. सिंह ने मौसम परिवर्तन के कारण बदलती पारिस्थितिकी में सूत्रकृमियों की व्यापक समस्या को लेकर आगाह किया। उन्होंने छात्रों को पौध संरक्षण के क्षेत्र में नए कृषि स्वरोजगार के अवसर तलाशने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन से सूत्रकृमियों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और विश्वविद्यालय में इस दिशा में चल रहे शोध कार्यों को नई गति मिलेगी।
निदेशक प्रशासन डॉ. राजेश कुमार ने कृषि में नेमाटोड्स से जुड़ी वैश्विक समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए इनके समाधान के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता बताई। बिहार कृषि महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. रूबी रानी ने उद्यानिकी फसलों में बढ़ते सूत्रकृमि प्रकोप पर चिंता जताते हुए वैज्ञानिकों से प्रभावी समाधान विकसित करने का आह्वान किया।
कीट विज्ञान विभाग की अध्यक्ष डॉ. किरण कुमारी ने सूत्रकृमियों के महत्व, फसलों को होने वाले नुकसान तथा विभाग की परियोजनाओं और शोध प्रयासों की जानकारी साझा की। कार्यक्रम में सह निदेशक शोध डॉ. चंदा कुशवाहा, पौधा रोग विभागाध्यक्ष डॉ. जे.एन. श्रीवास्तव समेत विभिन्न विभागों के संकाय सदस्य और परास्नातक विद्यार्थी उपस्थित रहे। 80 से अधिक प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। आयोजन सचिव डॉ. अनुकरण साहू ने स्वागत भाषण दिया, जबकि संचालन डॉ. संजय कुमार शर्मा ने किया। अंत में डॉ. रामानुज विश्वकर्मा ने सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।






