बिहार में देहदान और अंगदान अब धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। कभी संकोच और सामाजिक झिझक का विषय रहा देहदान आज हजारों लोगों की भागीदारी से जनचेतना का अभियान बन चुका है। राज्य में अब तक करीब 1600 लोगों ने नेत्रदान किया है, जिनमें से 1450 लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण के जरिए नई रोशनी मिल चुकी है।

इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें सभी वर्गों और समुदायों के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। शिक्षा जगत के जाने-माने नाम गुरु रहमान ने 13 साल पहले ही देहदान का संकल्प लेकर एक मिसाल पेश की। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी यदि किसी के अंग किसी और के काम आ जाएं, तो इससे बड़ा सेवा कार्य कुछ नहीं हो सकता। हालांकि इस फैसले के कारण उन्हें सामाजिक विरोध का सामना भी करना पड़ा।

वहीं चर्चित अधिवक्ता एसडी संजय और उनका पूरा परिवार भी इस अभियान से जुड़ा हुआ है। उन्होंने अपनी माताजी के निधन के बाद उनका नेत्रदान और देहदान कर समाज को प्रेरित किया। उनका कहना है कि देहदान के जरिए मेडिकल छात्रों को शिक्षा मिलती है और जरूरतमंदों को जीवनदान।

बिहार में देहदान अभियान की नींव वर्ष 2013 में रखी गई थी, जिसे आगे बढ़ाने में कई सामाजिक हस्तियों का योगदान रहा। आज राज्य के नौ मेडिकल कॉलेजों में कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा उपलब्ध है, जिनमें आईजीआईएमएस, पीएमसीएच और एम्स जैसे संस्थान शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य मृत्यु के बाद केवल कॉर्निया ही उपयोगी होता है, जबकि दुर्घटना या ब्रेन डेड की स्थिति में अन्य अंगों का भी दान संभव है। हालांकि बिहार में अभी कॉर्निया के अलावा अन्य अंग प्रत्यारोपण की सुविधाएं सीमित हैं।

लोगों को अंगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर NOTTO या राज्य स्तर पर SOTO में पंजीकरण कराना होता है। नंबर आने पर संबंधित व्यक्ति को सूचना दी जाती है और प्रक्रिया पूरी की जाती है।

देहदान अब केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का प्रतीक बनता जा रहा है।

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