बिहार के सरकारी स्कूलों में खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने के दावे के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। राज्य के लगभग 26 हजार स्कूलों में शारीरिक शिक्षक ही नहीं हैं, लेकिन सरकार ने 160 करोड़ रुपये की खेल सामग्री की खरीद कर ली है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिना गुरु के बच्चे आखिर खेल चैंपियन कैसे बनेंगे?

 

जानकारी के अनुसार बिहार के करीब 38 हजार सरकारी स्कूलों के लिए खेल सामग्री खरीदी गई है। स्कूलों को 5 हजार रुपये से लेकर 25 हजार रुपये तक की राशि खेल सामग्री खरीदने के लिए दी गई। सरकार का उद्देश्य स्कूल स्तर पर खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाना बताया गया, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है।

 

राज्य के 26 हजार स्कूलों में एक भी शारीरिक शिक्षक तैनात नहीं हैं। हालात यह हैं कि गणित के शिक्षक बच्चों को शतरंज की चाल सिखा रहे हैं, तो विज्ञान के शिक्षक मैदान में फुटबॉल की किक समझाने को मजबूर हैं। खेल प्रशिक्षण के अभाव में खेल सामग्री केवल कमरों की शोभा बनकर रह गई है।

 

पिछले तीन चरणों की शिक्षक नियुक्ति—टीआरई 1, 2 और 3—में कुल 2.55 लाख शिक्षकों की बहाली हुई, लेकिन इनमें शारीरिक शिक्षकों की संख्या बेहद कम रही। आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 512 शारीरिक शिक्षकों की ही नियुक्ति हुई। फिलहाल बिहार के केवल 12 हजार स्कूलों में ही शारीरिक शिक्षक कार्यरत हैं, जिनमें मिडिल स्कूलों में 9 हजार और 9वीं से 12वीं तक के स्कूलों में लगभग 3 हजार शिक्षक शामिल हैं।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल खेल सामग्री खरीद लेने से खिलाड़ी तैयार नहीं होते। जब तक प्रशिक्षित कोच और शारीरिक शिक्षक स्कूलों में उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक खेल प्रतिभाओं का विकास संभव नहीं है।

 

सरकार एक ओर खेल बजट बढ़ाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर मानव संसाधन की भारी कमी इस योजना की सफलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है। अब देखना होगा कि सरकार इस गंभीर समस्या का समाधान कब तक निकालती है।

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