मध्य पूर्व में बढ़ते युद्ध और तनाव का असर अब सीधे भारतीय घरों की रसोई तक पहुंचने लगा है। ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसका असर भारत पर भी साफ दिख रहा है, जो अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। देश इस समय गैस सप्लाई के गंभीर संकट का सामना कर रहा है।

इसी स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां एक बड़ा कदम उठाने पर विचार कर रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा 14.2 किलो के घरेलू गैस सिलेंडर की जगह 10 किलो गैस वाले सिलेंडर लाने की योजना बनाई जा रही है। इसका मकसद सीमित स्टॉक के बावजूद ज्यादा से ज्यादा परिवारों तक गैस पहुंचाना है।

अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो सिलेंडर की कीमत भी उसी अनुपात में घटाई जाएगी। उदाहरण के तौर पर, यदि 14.2 किलो का सिलेंडर करीब 913 रुपये का है, तो 10 किलो वाले सिलेंडर की कीमत लगभग 640 से 650 रुपये के बीच हो सकती है। उपभोक्ताओं के बीच किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए नए सिलेंडरों पर अलग रंग या विशेष स्टिकर लगाए जाने की योजना है।

संकट की सबसे बड़ी वजह हॉर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से भारत का लगभग 90 प्रतिशत गैस आयात होता है। यह क्षेत्र मौजूदा संघर्ष के बेहद करीब है, जिसके कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले सप्ताह भारत को केवल 92,700 टन गैस ही मिल पाई, जो देश की एक दिन की जरूरत के बराबर है।

स्थिति को संभालने के लिए सरकार पहले ही बुकिंग और सप्लाई से जुड़े कुछ सख्त नियम लागू कर चुकी है। हालांकि, ऑयल कंपनियों ने चेतावनी दी है कि अचानक बदलाव से उपभोक्ताओं में भ्रम और असंतोष बढ़ सकता है। साथ ही, बॉटलिंग प्लांट्स में तकनीकी बदलाव भी चुनौतीपूर्ण होगा।

फिलहाल सरकार की प्राथमिकता किसी भी कीमत पर गैस की पूरी तरह कमी यानी ‘ड्राई-आउट’ की स्थिति से बचना है। आने वाले दिन भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।

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