देशभर में एलपीजी गैस की किल्लत और कालाबाजारी की खबरों के बीच बिहार के अररिया जिले का एक गांव आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभरा है। रानीगंज विधानसभा क्षेत्र के इंद्रपुर गांव में बायोगैस प्लांट ने ग्रामीणों की जिंदगी बदल दी है, जहां अब गैस संकट का कोई असर देखने को नहीं मिल रहा।
इंद्रपुर गांव में करीब छह महीने पहले स्थापित बायोगैस प्लांट आज ग्रामीणों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इस प्लांट से पाइपलाइन के जरिए घर-घर गैस की आपूर्ति की जा रही है, जिससे लोगों की रसोई बिना किसी बाधा के चल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें गैस सिलेंडर के लिए लाइन में लगने या महंगे दामों पर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
पहले जहां लकड़ी और उपले से खाना बनता था और धुएं से परेशानी होती थी, वहीं अब बायोगैस के उपयोग से रसोई धुआंमुक्त हो गई है। इससे महिलाओं की मेहनत भी कम हुई है और परिवारों का खर्च भी घटा है।
गांव में रोजाना सुबह 6 बजे से 9 बजे तक और शाम 4 बजे से 7 बजे तक नियमित रूप से गैस आपूर्ति की जाती है। गैस के दबाव और शुद्धता को बनाए रखने के लिए विशेष किट और बैलून सिस्टम का भी उपयोग किया जा रहा है।
रानीगंज के कृषि समन्वयक बलराम कुमार ने बताया कि बायोगैस प्लांट लगाने के लिए किसान कृषि विभाग के पोर्टल पर आवेदन करते हैं, जिसके बाद सत्यापन और स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की जाती है। एक प्लांट पर लगभग 42 से 45 हजार रुपये खर्च आता है, जिसमें 21 हजार रुपये तक का अनुदान दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि एक प्लांट से 30 से 40 परिवारों को गैस मिल सकती है और 2 घन मीटर क्षमता वाला टैंक एक महीने में डेढ़ से दो एलपीजी सिलेंडर के बराबर गैस उत्पादन करता है।
कुल मिलाकर, इंद्रपुर गांव का यह मॉडल न सिर्फ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी पहल है, बल्कि स्वच्छ पर्यावरण और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दे रहा है।
रिपोर्ट: अरुण कुमार
