पक्षी: कभी हर घर-आंगन की पहचान रही गौरैया जब अचानक गायब हो गई, तो यह सिर्फ एक पक्षी का होना नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन पर खतरे का संकेत था। जंगलों के बढ़ते प्रभाव, मोबाइल टावरों का प्रभाव और बाजारों के बढ़ते उपयोग ने इस नन्हीं शहर की आबादी को 60 से 80 प्रतिशत तक कम कर दिया है। यह संकट धीरे-धीरे बिहार के कश्मीर तक भी पहुंच गया।

इसी बीच तेतरावां गांव से एक उम्मीद की किरण जगी। विद एनवायर्नमेंटल रशियन रयान रयान ने साल 2010 में इस चुनौती को स्वीकार किया था, जब उनके आसपास सिर्फ 8-10 गौरैया बोली थीं। उन्होंने छोटे-छोटे कदमों से शुरुआत की—घर के बाहर दाना-पानी रखना, कृत्रिम रचनात्मकता बनाना और लोगों को एकजुट करना।

यह प्रयास धीरे-धीरे-दारा आंदोलन में बदल गया। करीब एक दशक की मेहनत के बाद साल 2020 तक घर के आसपास गौरैया की संख्या 400 से ज्यादा हो गई, जबकि पूरे गांव में यह पात्र 2000 पार कर गया। आज तेतरावां गांव में फिर से हर सुबह चहचहाट गूंजती है।

इस पहल की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है। नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और इंडोनेशिया तक से लोग इस मॉडल को समझा रहे हैं। ‘मिशन गौरैया’ अब सिर्फ एक अभियान नहीं है, बल्कि जन आंदोलन बन गया है, जिससे देश के 21 राज्यों के लोग जुड़ गए हैं।

विशेष रूप से यह है कि इस पहले से सिर्फ गौरैया ही नहीं, बल्कि मैना, कोयल, सनबर्ड, किंगफिशर और अन्य पक्षियों की भी वापसी हुई है। विशेषज्ञ के अनुसार, घोंसलों की कमी, भोजन की कमी, कीटनाशकों का उपयोग और रेडिएशन इसका मुख्य कारण हैं।

हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है, ताकि लोगों में जागरूकता बढ़े। बेकार की यह कहानी बताती है कि अगर सामूहिक प्रयास हो, तो प्रकृति को फिर से जीवंत बनाया जा सकता है।

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