बिहार के मटिहानी गांव में एक अनोखा झोपड़ा तैयार किया गया है, जो आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक आयुर्वेद का अनोखा मेल माना जा रहा है। इस झोपड़े की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके निर्माण में न तो सूखे का उपयोग हुआ और न ही पानी का। इसके स्थान पर गोमूत्र, गोबर तथा अनेक औषधीय औषधियों-मार्च का प्रयोग किया जाता है।
इस झोपड़े का निर्माण स्थानीय निवासी बज्रजेन्द्र कुमार आश्रम ने किया है। क्लोज पार्ट कत्थे में बने इस प्लास्टिक में क्लस्टरों को जोड़ने के लिए क्लब, नीम, हल्दी, बबूल गोंद का, कोयला, रामराज मिट्टी, हर्र-बहेड़ा और अन्य मसाले- मसाले के मिश्रण का उपयोग किया गया है। दीवारों के प्लास्टर और मशीनों में भी यही प्राकृतिक सामग्री बनाई गई है।
निर्माता के अनुसार, यह झोपड़ा पंचगव्य चिकित्सा पद्धति पर आधारित है और पूरी तरह से “एंटीवायरस” है। उनका दावा है कि नीम, हल्दी और गोमूत्र जैसे दस्तावेज और वायरस पठथ में नहीं आ सकते। साथ ही, यह झोपड़ा गर्मी में ठंडा और भाप में गर्म रहता है, जिससे प्राकृतिक रूप से तापमान नियंत्रित होता है।
विशेषज्ञ भी इस प्रयोग को दिलचस्प मान रहे हैं। नगर निगम के निगम के अनुसार, गोबर और मिट्टी से बने मकान पहले भी मिसाल थे और ये काफी टिकाऊ और ठंडे होते हैं। वहीं शिक्षा विशेषज्ञ का कहना है कि प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग पर्यावरण के लिए बेहतर है और आधुनिक पेंट या एलेक्युमेन्ट का कम नुकसान होता है।
करीब 5 लाख रुपये की लागत से बनने वाली इस झोपड़ी को भविष्य में पंचगव्य चिकित्सा केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। निर्माण में समापन माह का समय लगा। यह प्रयोग न केवल पारंपरिक ज्ञान को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, बल्कि पर्यावरण अनुकूल निर्माण की दिशा में एक नई सोच भी प्रस्तुत करता है।
