बिहार के नालंदा जिले की बिहारशरीफ मंडल कारा से जेल प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है। अदालत से जमानत एक कैदी को मिली, लेकिन जेल प्रशासन ने उसकी जगह दूसरे बंदी को रिहा कर दिया। नामों में समानता और कागजी प्रक्रिया में हुई चूक के कारण यह गड़बड़ी हुई। हैरानी की बात यह है कि जेल प्रशासन को सात दिनों तक इसकी भनक तक नहीं लगी। मामला सामने आने के बाद जेल आईजी ने तीन जेलकर्मियों को निलंबित कर दिया है।
मामला अस्थावां थाना क्षेत्र से जुड़े अलग-अलग आपराधिक मामलों में बंद सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद और चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद से संबंधित है। जानकारी के मुताबिक, सतीश चौहान के पिता का नाम भी चंद्रदीप है। इसी नाम की समानता के कारण पहचान में गड़बड़ी होने की आशंका जताई गई है।
आरोप है कि 24 सितंबर को जमानत पर रिहाई के दौरान वास्तविक रूप से जमानत पाने वाले सतीश चौहान की जगह चंद्रदीप चौहान को जेल से बाहर जाने दिया गया। जबकि सतीश जेल में ही बंद रहा।
इस चूक का खुलासा तत्काल नहीं हुआ। करीब सात दिनों बाद, एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट तैयार होने पर मामले की जानकारी सामने आई। इसके बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया और रिहाई से संबंधित दस्तावेजों की जांच शुरू की गई।
गड़बड़ी सामने आने के बाद दो अक्टूबर की सुबह वास्तविक जमानत प्राप्त कैदी सतीश चौहान को विधिवत रिहा किया गया। वहीं, गलत पहचान के आधार पर जेल से बाहर निकला चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना उसी दिन दोपहर करीब तीन बजे स्थानीय अदालत पहुंचा और सरेंडर कर दिया।
मामले में यह भी सामने आया कि चंद्रदीप के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज थे। उसे एक मामले में जमानत मिली थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत लंबित थी। इसके बावजूद वह जेल से बाहर कैसे निकला, यह जांच का विषय है।
इस प्रकरण को लेकर एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने भी वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।
जेल अधीक्षक की रिपोर्ट और प्रारंभिक जांच के आधार पर जेल आईजी ने लापरवाही के आरोप में तीन जेलकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। अब सवाल है कि कैदी की पहचान और जमानत आदेशों की जांच में इतनी बड़ी चूक आखिर कैसे हुई?






