पटना: बिहार की राजनीति में लंबे समय से चल रहे संवैधानिक और राजनीतिक विवाद के बीच पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को बड़ी राहत मिली है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश अब बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) बन गए हैं। उनका मनोनयन राज्यपाल कोटे से किया गया है। जानकारी के अनुसार, सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस फैसले को मंजूरी दी गई, हालांकि यह निर्णय आधिकारिक 17 एजेंडों की सूची में शामिल नहीं था।
दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाए जाने के बाद आरएलएम अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एनडीए के राष्ट्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सहित सभी सहयोगी दलों के नेताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एनडीए ने समय रहते इस मुद्दे का समाधान निकाल लिया।
दरअसल, दीपक प्रकाश को बिना किसी सदन का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री बनाए रखने को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बिहार सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर संबंधित व्यक्ति का किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।
दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनाया गया था। उनकी छह महीने की संवैधानिक अवधि मई 2026 में समाप्त हो गई थी। इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई एनडीए सरकार बनने पर उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जिसे लेकर विपक्ष और याचिकाकर्ताओं ने संविधान की भावना के विपरीत बताया।
सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि एक ही विधानसभा कार्यकाल के दौरान दोबारा शपथ दिलाकर संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया गया। अब राज्यपाल कोटे से एमएलसी बनने के बाद दीपक प्रकाश की सदस्यता का मुद्दा तो सुलझ गया है, लेकिन पहले से लंबित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।




