पटना: बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान वर्ष 2024-25 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट सदन में पेश की गई। रिपोर्ट में राज्य की वित्तीय व्यवस्था और बजटीय प्रबंधन को लेकर कई गंभीर टिप्पणियां की गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024-25 में बिहार का कुल बजट बढ़कर 3 लाख 64 हजार 518 करोड़ 87 लाख रुपये पहुंच गया। इसके बावजूद सरकार केवल 2 लाख 87 हजार 178 करोड़ 49 लाख रुपये ही खर्च कर सकी। यानी कुल बजट का करीब 21.22 प्रतिशत, लगभग 77 हजार 340 करोड़ रुपये, खर्च नहीं हो पाया। सीएजी ने इसे बजट अनुमान और वास्तविक जरूरतों के बीच सही आकलन की कमी बताया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 12 अनुदानों के तहत 35 मामलों में 6,225 करोड़ रुपये के अनुपूरक बजट प्रावधान अनावश्यक साबित हुए। वहीं, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए 441.29 करोड़ रुपये अपेक्षित केंद्रांश से कम प्राप्त हुए। इसके अलावा केंद्रांश और राज्यांश के हस्तांतरण में क्रमशः 167 दिन और 246 दिन तक की देरी दर्ज की गई, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।
सीएजी ने उपयोगिता प्रमाण पत्र यानी यूसी लंबित रहने पर भी चिंता जताई है। वर्ष 2025 तक 93 हजार 132 करोड़ रुपये से जुड़े 62 हजार 632 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित पाए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 26.15 प्रतिशत अधिक हैं। इसके साथ ही 10 हजार 361 करोड़ रुपये से अधिक के 19 हजार 487 विपत्र भी समायोजन की प्रतीक्षा में लंबित हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में बिहार का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 4.16 प्रतिशत रहा, जो निर्धारित 3.5 प्रतिशत की सीमा से अधिक है। हालांकि राज्य की कुल देनदारियां तय सीमा के भीतर बनी हुई हैं।
सीएजी ने यह भी बताया कि राज्य की 48 प्रतिशत राजस्व प्राप्तियां वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे प्रतिबद्ध खर्चों में चली गईं। इसके कारण विकास योजनाओं और पूंजीगत निवेश के लिए केवल 52 प्रतिशत संसाधन उपलब्ध रह सके। रिपोर्ट में वित्तीय अनुशासन, बजट नियोजन और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।






