गया जिले के अतरी प्रखंड के केवटी गांव के रामचंद्र यादव की कहानी संघर्ष, जिद और समाज सेवा की मिसाल है। बचपन में पिता की हत्या के बाद वे अपने ननिहाल केवटी आकर बस गए। बड़े होकर ट्रक चालक बने, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण उन्हें और ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को पहाड़ पार कर अस्पताल ले जाना पड़ता था, जिससे कई लोगों की जान भी चली जाती थी।
इसी दर्द ने रामचंद्र यादव को कुछ बड़ा करने की प्रेरणा दी। साल 1992 में उनकी मुलाकात ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी से हुई। जब उन्होंने पहाड़ काटने में मदद मांगी तो मांझी ने कहा, “तोड़ोगे तब न टूटेगा, बैठे रहने से कुछ नहीं होगा।” यही बात रामचंद्र के जीवन का संकल्प बन गई।
साल 1993 में उन्होंने केवल छेनी और हथौड़ी के सहारे अकेले पहाड़ काटना शुरू किया। लोग उन्हें पागल कहकर मजाक उड़ाते रहे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मकई का भात और सूखी रोटी खाकर 23 वर्षों तक लगातार मेहनत की और 2015 में करीब 15 फीट चौड़ी सड़क तैयार कर दी।
आज इस सड़क से केवटी समेत लगभग 25 गांवों के लोगों का आवागमन आसान हो गया है। स्कूल बसें, एंबुलेंस और अन्य वाहन अब सीधे गांव तक पहुंचते हैं। हजारों लोगों की दूरी कई किलोमीटर कम हो गई है।
हालांकि सड़क बनने के बाद सम्मान की जगह रामचंद्र यादव पर वन विभाग ने केस दर्ज किया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वर्ष 2015 से अब तक वे अपने दम पर सड़क को समतल करने में जुटे हैं ताकि लोगों को और बेहतर सुविधा मिल सके।
ग्रामीण आज उन्हें ‘माउंटेन मैन-2’ के नाम से सम्मान देते हैं। रामचंद्र यादव की एक ही उम्मीद है कि सरकार इस सड़क को पक्का बनवा दे। उनकी कहानी बताती है कि मजबूत इरादे और समाज सेवा की भावना के सामने सबसे ऊंचा पहाड़ भी झुक जाता है।








