“नजर नहीं, नजरिया बड़ा: वैशाली के दृष्टिहीन किसान ने 10 बीघा में उगाई सफलता की फसल”

वैशाली के लालगंज प्रखंड के बसंता जहानाबाद गांव से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने साबित कर दिया कि सफलता के लिए आंखों की रोशनी नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और सही सोच की जरूरत होती है। गांव के किसान प्रमोद सिंह दोनों आंखों से पूरी तरह दृष्टिहीन हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत, अनुभव और आत्मविश्वास के दम पर खेती में ऐसी मिसाल कायम की है, जो पूरे बिहार के किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है।

प्रमोद सिंह आंखों से नहीं देख सकते, फिर भी वे तरबूज, टमाटर समेत कई नकदी फसलों की खेती खुद योजनाबद्ध तरीके से करते हैं। खेत में जाकर पौधों को स्पर्श से उनकी स्थिति समझते हैं, मिट्टी की नमी का अंदाजा लगाते हैं और उसी आधार पर मजदूरों को जरूरी निर्देश देते हैं। परिवार और मजदूर उनका सहयोग करते हैं, लेकिन पूरी खेती की रणनीति और निगरानी वही संभालते हैं।

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इस वर्ष उन्होंने 10 बीघा जमीन में तरबूज की खेती की है, जिस पर करीब 5 लाख रुपये की लागत आई। अच्छी फसल के आधार पर उन्हें लगभग 10 लाख रुपये तक मुनाफे की उम्मीद है। प्रमोद सिंह का कहना है कि यदि आधुनिक तकनीक, समय पर देखभाल और बाजार की मांग को समझकर खेती की जाए तो यह सबसे सम्मानजनक और लाभकारी पेशा बन सकता है।

वे कहते हैं, “सरकारी नौकरी नहीं हो तो क्या हुआ, सही तरीके से खेती करेंगे तो उससे बेहतर कमाई हो सकती है। आज इसी खेती से परिवार चलता है और बच्चों को सीबीएसई स्कूल में पढ़ा रहे हैं।”

प्रमोद सिंह किसानों को संदेश देते हैं कि खेती को घाटे का सौदा मानने के बजाय वैज्ञानिक तरीके अपनाने चाहिए। उनका मानना है कि “सरकारी नौकरी नहीं तो तरकारी नौकरी करिए। मेहनत, तकनीक और सही प्रबंधन से खेती में भी शानदार भविष्य बनाया जा सकता है।”

प्रमोद सिंह की सफलता ने आसपास के किसानों का नजरिया बदल दिया है। दूर-दूर से लोग उनके खेत देखने पहुंच रहे हैं। उनकी कहानी यह सिखाती है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि सोच और हौसले में होती है। सच ही कहा गया है—नजर नहीं, नजरिया बड़ा होता है।

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