जहां लगती थी नक्सलियों की जन अदालत, वहां अब सजती है ग्रामीण चौपाल; गया के धनगाई की बदली तस्वीर

गया जिले के धनगाई गांव में एक समय नक्सलियों की जन अदालत लगती थी, जहां उनके फरमान ही कानून माने जाते थे। आज उसी भवन में पंचायत और चौपाल लगती है, जहां ग्रामीण खुलकर अपनी समस्याएं रखते हैं और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते हैं। यह बदलाव इलाके में आए शांति और विकास का प्रतीक बन गया है।

ग्रामीणों के अनुसार, ब्रिटिश काल में बना यह भवन कभी वन विभाग का रेस्ट हाउस था, लेकिन नक्सलवाद के दौर में यह माओवादियों का मुख्य ठिकाना बन गया। यहां जन अदालतें लगती थीं, जिनमें कथित दोषियों को सार्वजनिक रूप से सजा दी जाती थी। ग्रामीण भय के माहौल में इन बैठकों में शामिल होने को मजबूर होते थे।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि 1989 से 2015 तक धनगाई और आसपास के इलाके नक्सल प्रभाव में रहे। नक्सली संगठन का इतना दबदबा था कि लोग उनके फैसलों का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। कई ग्रामीणों को मजबूरी में जन अदालतों का हिस्सा बनना पड़ता था।

मगध क्षेत्र का गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा और औरंगाबाद लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों का केंद्र रहे। दक्षिण गया का इलाका नक्सलियों की “राजधानी” माना जाता था। यहां कई बड़ी घटनाएं हुईं, जिनमें नरसंहार, बारूदी सुरंग विस्फोट और सुरक्षा बलों पर हमले शामिल रहे।

हालांकि, सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, सीआरपीएफ, एसएसबी, एसटीएफ और पुलिस की कार्रवाई के साथ-साथ सड़क, पुल, संचार और अन्य विकास कार्यों ने हालात बदल दिए। सिविक एक्शन कार्यक्रमों और सरकारी योजनाओं ने भी लोगों का विश्वास बढ़ाया।

गया के एसएसपी सुशील कुमार के अनुसार, नक्सली गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। सुरक्षा बल अभी भी नियमित सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं ताकि नक्सलवाद दोबारा सिर न उठा सके।

आज धनगाई में जहां कभी डर और दहशत का माहौल था, वहां अब बाजार गुलजार हैं, पंचायतें लग रही हैं और लोग भयमुक्त जीवन जी रहे हैं। यह बदलाव बिहार में लाल आतंक से विकास और शांति की ओर बढ़ते कदमों की कहानी बयां करता है।

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