बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल, 67.8% मौतें बिना मेडिकल अटेंशन के; झोलाछापों पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती


पटना। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य में 67.8 प्रतिशत मौतें ऐसी परिस्थितियों में हुईं, जहां मरीजों को मृत्यु से पहले प्रशिक्षित चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल सकी। यह आंकड़ा देश में सबसे चिंताजनक स्थिति में गिना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार हर साल करीब 4.96 लाख लोग अस्पताल पहुंचने से पहले घर, रास्ते या अप्रशिक्षित चिकित्सकों की देखरेख में दम तोड़ देते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर है। यहां 69.4 प्रतिशत मौतों के दौरान प्रशिक्षित डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 58.1 प्रतिशत रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों की कमी, कमजोर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और झोलाछाप चिकित्सकों पर बढ़ती निर्भरता इसके प्रमुख कारण हैं।

हाल के कई मामलों ने भी स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है। पूर्णिया में कथित गलत इंजेक्शन लगाने से 10 वर्षीय बच्चे की मौत का मामला सामने आया। शिवहर में सड़क हादसे में घायल दारोगा के फ्रैक्चर पैर को गत्ते और सलाइन पाइप से बांधने की तस्वीरें वायरल हुईं। वहीं भागलपुर में एक महिला की मौत के बाद आरोप लगा कि यूट्यूब देखकर सिजेरियन ऑपरेशन किया गया था।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत किए बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं है। पद्मश्री सम्मानित चिकित्सक डॉ. हेमंत ने स्वास्थ्यकर्मियों के बेहतर प्रशिक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और विशेषज्ञों की निगरानी पर जोर दिया है। वहीं वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सुनील का कहना है कि पीएचसी, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों के बीच मजबूत स्वास्थ्य श्रृंखला विकसित करनी होगी।

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रिपोर्ट और हालिया घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग भी सक्रिय हुआ है। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने अधिकारियों को कमियां दूर करने के निर्देश दिए हैं और समयसीमा के भीतर सुधार नहीं होने पर कार्रवाई की चेतावनी दी है।

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