विश्व पर्यावरण दिवस पर बीएयू सबौर में मंथन, उर्वरक खपत 40% तक घटाने की रणनीति पर जोर

भागलपुर: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के मृदा विज्ञान विभाग एवं भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी (ISSLUP) सबौर चैप्टर के संयुक्त तत्वावधान में “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर विचार-मंथन सत्र आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि उत्पादकता को बनाए रखते हुए उर्वरकों की खपत कम करने के लिए वैज्ञानिक, जैविक और तकनीकी उपायों पर चर्चा करना था।

कार्यक्रम का आयोजन कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के संरक्षण में हुआ। सत्र की अध्यक्षता मृदा विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अंशुमान कोहली ने की। कार्यक्रम की शुरुआत कुलपति द्वारा पौधारोपण से हुई, जो पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा। इस दौरान बीएसी एवं सीएबीटी के राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।

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स्वागत भाषण में डॉ. अंशुमान कोहली ने बढ़ती उर्वरक लागत और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य वक्ता डॉ. बिजय सिंह ने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा तथा प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों को अपनाने पर जोर दिया।

तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती, पोषक तत्व पुनर्चक्रण, जैविक विकल्प, सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स, वर्मी-कम्पोस्ट, ड्रोन एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रिसिजन कृषि, पीजीपीआर तथा भू-स्थानिक तकनीकों के उपयोग पर विस्तार से चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि इन आधुनिक और जैविक उपायों को अपनाकर बिहार में रासायनिक उर्वरकों की खपत 20 से 40 प्रतिशत तक कम की जा सकती है, जबकि फसल उत्पादकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

विचार-विमर्श के दौरान प्रतिभागियों ने उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने और कृषि लागत कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। विशेषज्ञों ने कहा कि सतत कृषि विकास के लिए जैविक उपायों, प्रिसिजन कृषि और वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वित उपयोग आवश्यक है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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