गया: बिहार के गया जिले के फतेहपुर प्रखंड स्थित मनहोना गांव में एक अनोखा गुरुकुल आज शिक्षा और सफलता की नई कहानी लिख रहा है। इस गुरुकुल का संचालन नरेश भारती पिछले 15 वर्षों से कर रहे हैं। कभी पेड़ के नीचे और प्लास्टिक की झोपड़ी में शुरू हुई यह पाठशाला आज आसपास के कई गांवों के युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता बन चुकी है।
नरेश भारती का उद्देश्य नक्सल प्रभावित और पिछड़े इलाके के बच्चों को शिक्षा के जरिए नई दिशा देना था। उन्होंने चार छात्रों के साथ गुरुकुल की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज उसी गुरुकुल से पढ़कर करीब 150 छात्र-छात्राएं बिहार पुलिस, रेलवे, शिक्षक और अन्य सरकारी सेवाओं में नौकरी पा चुके हैं।
यहां छात्रों को निशुल्क शिक्षा के साथ-साथ फिजिकल ट्रेनिंग, प्राणायाम और अनुशासित जीवन का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। बिहार पुलिस में सिपाही बनी प्रीति कुमारी बताती हैं कि उन्होंने यहीं से फिजिकल तैयारी की और सफलता हासिल की। वहीं छात्र रिशु कुमार का कहना है कि गरीब परिवार से होने के बावजूद उन्हें यहां मुफ्त में बेहतर मार्गदर्शन मिल रहा है।
नरेश भारती खुद रेलवे में टेक्नीशियन हैं। नौकरी के बाद का समय वह बच्चों को पढ़ाने और ट्रेनिंग देने में लगाते हैं। अपनी आय का एक हिस्सा भी गुरुकुल के संचालन और छात्रों की जरूरतों पर खर्च करते हैं। उनके प्रयासों से कई छात्र बीएसएफ, आरपीएफ, बिहार पुलिस और रेलवे जैसी सेवाओं में पहुंचे हैं।
नरेश भारती का कहना है कि ग्रामीण और जंगल क्षेत्रों के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती, उन्हें सिर्फ सही मार्गदर्शन और अवसर की जरूरत होती है। उनका अगला लक्ष्य 1000 बच्चों को सरकारी नौकरी तक पहुंचाना है।
एक साधारण झोपड़ी में चल रहा यह गुरुकुल आज बदलाव की ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसने सैकड़ों गरीब परिवारों के सपनों को नई उड़ान दी है और पूरे क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगा दी है।