विश्व साइकिल दिवस पर बिहार की मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना की सफलता एक बार फिर चर्चा में है। वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा शुरू की गई इस योजना ने राज्य की लाखों बेटियों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया। जिस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के लिए स्कूल तक पहुंचना मुश्किल था, उस समय साइकिल ने उन्हें शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया।
गया जिले की रीता कुमारी इसका जीवंत उदाहरण हैं। नौवीं कक्षा में मिली साइकिल की मदद से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और आज सिविल कोर्ट में सहायक के पद पर कार्यरत हैं। उनका कहना है कि इस योजना ने गांव की लड़कियों को घर की चौखट से निकालकर सपनों की उड़ान दी। इसी तरह रागिनी कुमारी, रिमझिम कुमारी और नालंदा की कई छात्राओं ने साइकिल के सहारे शिक्षा हासिल कर अपने भविष्य को नई दिशा दी।
इस योजना की शुरुआत उस समय हुई जब जनता दरबार में छात्राओं ने स्कूल की दूरी और आवागमन की कठिनाइयों की समस्या मुख्यमंत्री के सामने रखी। इसके बाद सरकार ने नौवीं कक्षा की छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए आर्थिक सहायता देने का फैसला लिया। बाद में यह योजना लड़कों तक भी विस्तारित कर दी गई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2005 में जहां मैट्रिक परीक्षा में करीब 1.87 लाख छात्राएं शामिल हुई थीं, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर 6.34 लाख से अधिक हो गई। महिलाओं की साक्षरता दर में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आज राज्य की लाखों छात्राएं इस योजना का लाभ उठा रही हैं और हर वर्ष लाखों नए लाभार्थी इससे जुड़ रहे हैं।
योजना की सफलता का असर केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा। इसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंची और अफ्रीकी देशों ने भी इसे अपनाने में रुचि दिखाई। विशेषज्ञों का मानना है कि साइकिल योजना ने सिर्फ परिवहन का साधन नहीं दिया, बल्कि सामाजिक सोच बदलने, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम किया।
दो दशक बाद यह योजना बिहार में सामाजिक परिवर्तन की एक सफल मिसाल बन चुकी है, जिसने लाखों बेटियों को अपने सपनों तक पहुंचने का रास्ता दिया।