गया जिले के बालासोत और हरिदासपुर गांव आज पूरे बिहार के लिए मिसाल बने हुए हैं। राज्य में जहां 2016 में शराबबंदी लागू हुई, वहीं इन दोनों गांवों ने 2014 में ही सामाजिक सहमति से शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। यह सरकार का नहीं, बल्कि ग्रामीणों द्वारा बनाया गया कानून था।
उस समय गांवों की स्थिति बेहद खराब थी। जगह-जगह शराब की भट्ठियां चलती थीं, लोग सुबह से ही नशे में डूबे रहते थे और आए दिन मारपीट व घरेलू विवाद होते थे। शराब की बदनामी इतनी थी कि लोग यहां अपनी बेटियों की शादी करने से भी कतराते थे।
स्थिति बदलने के लिए गांव के शिक्षित युवाओं ने पहल की। वर्ष 2014 में बैठक बुलाकर 21 सदस्यीय कमेटी बनाई गई और सर्वसम्मति से शराबबंदी का फैसला लिया गया। नियम तोड़ने वालों पर जुर्माने का प्रावधान किया गया। पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर 500 रुपये, दूसरी बार 1000 रुपये और गंभीर मामलों में 11 हजार रुपये तक का जुर्माना तय किया गया।
ग्रामीण योगेंद्र यादव बताते हैं कि वे स्वयं एक बार शराब पीते पकड़े गए थे और 500 रुपये का जुर्माना भरना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। गांव में अब तक करीब 500 लोगों पर कार्रवाई हो चुकी है।
जुर्माने से जमा धन का उपयोग भी समाजहित में किया गया। ग्रामीणों ने इस राशि और जनसहयोग से हरिदासपुर में ‘मनोकामना सिद्धेश्वर महादेव’ मंदिर का निर्माण कराया तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता शुरू की।
शराबबंदी के बाद गांव में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक माहौल में बड़ा बदलाव आया। पहले जहां गिने-चुने बच्चे मैट्रिक परीक्षा देते थे, वहीं अब हर साल 50 से अधिक छात्र परीक्षा में शामिल होते हैं। कई युवा रेलवे, कृषि विभाग, शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि आज भी कमेटी सक्रिय है और प्रशासन की कार्रवाई से अलग सामाजिक नियम सख्ती से लागू किए जाते हैं। उनका मानना है कि शराबबंदी ने गांव को नई पहचान दी है, सामाजिक सद्भाव बढ़ाया है और विकास की राह पर आगे बढ़ाया है।