बिहार के जमुई जिले के खैरा प्रखंड स्थित केंडीह गांव के शिक्षा सेवक जयकांत मांझी आज पूरे इलाके में प्रेरणा का प्रतीक बन चुके हैं। महादलित बस्ती के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए उन्होंने ऐसा कदम उठाया है, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है। ग्रामीण उन्हें दलितों का मसीहा और दूसरा दशरथ मांझी कहकर पुकारते हैं।
जयकांत मांझी ने संकल्प लिया कि उनके समाज का कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कर्ज और अपनी जमा पूंजी से 70 हजार रुपये में एक पुराना ई-रिक्शा खरीदा। आज वह इसी टोटो से रोज करीब 80 बच्चों को नि:शुल्क स्कूल पहुंचाते और वापस घर लाते हैं। स्कूल बस्ती से लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर दूर है, इसलिए बच्चों को आने-जाने में काफी परेशानी होती थी।
इस पहल की शुरुआत ई-रिक्शा से नहीं, बल्कि एक पुरानी लूना बाइक से हुई थी। जयकांत कई फेरे लगाकर बच्चों को स्कूल पहुंचाते थे, लेकिन जब बच्चों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने टोटो खरीद लिया। अब उन्हें रोज 8 से 10 फेरे लगाने पड़ते हैं।
जयकांत बताते हैं कि बचपन में उन्होंने खुद गरीबी और शिक्षा की कमी का दर्द झेला है। वह नहीं चाहते कि वही कठिनाइयां आज की पीढ़ी को झेलनी पड़ें। टोला सेवक बनने के बाद उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को शिक्षा का महत्व समझाया। हालांकि बच्चों की स्कूल में नियमित उपस्थिति नहीं हो पा रही थी।
एक दिन उन्होंने देखा कि निजी स्कूलों की गाड़ियां संपन्न परिवारों के बच्चों को लेने आती हैं, जबकि गरीब बच्चे उन्हें हसरत भरी नजरों से देखते हैं। बच्चों ने उनसे कहा कि स्कूल दूर होने के कारण वे रोज पैदल नहीं जा पाते। यही बात जयकांत के दिल को छू गई और उन्होंने बच्चों को मुफ्त स्कूल पहुंचाने का फैसला कर लिया।
आज उनकी मेहनत का नतीजा यह है कि बस्ती के लगभग सभी बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं। जयकांत मांझी की यह पहल साबित करती है कि समाज में बड़ा बदलाव लाने के लिए एक व्यक्ति का संकल्प भी काफी होता है।