पटना: बिहार की सियासत में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सफर लंबा, संघर्षपूर्ण और अब बेहद प्रभावशाली हो चुका है. करीब दो दशकों की मेहनत के बाद पार्टी न सिर्फ सत्ता के शीर्ष तक पहुंची, बल्कि राज्य में “बड़े भाई” की भूमिका भी हासिल कर ली. इस पूरे सफर में एक दिलचस्प पैटर्न उभरकर सामने आया है—‘S’ फैक्टर. यानी जब-जब पार्टी की कमान ऐसे नेताओं के हाथ में रही, जिनका नाम ‘S’ से शुरू होता है, तब-तब बीजेपी को उल्लेखनीय सफलता मिली.

साल 2005 में सुशील मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पहली बार बिहार की सत्ता में मजबूत एंट्री की. एनडीए सरकार बनी और बीजेपी को 55 सीटें मिलीं. सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री बने और पार्टी ने राज्य की राजनीति में अपनी ठोस मौजूदगी दर्ज कराई.

इसके बाद 2020 में संजय जायसवाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने पर बीजेपी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 74 सीटें जीतीं और एनडीए में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इस दौर में पार्टी को दो उपमुख्यमंत्री पद भी मिले, जो उसकी बढ़ती ताकत का संकेत था.

साल 2023 में सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. उनके नेतृत्व में पार्टी ने आक्रामक रणनीति अपनाई, संगठन का विस्तार किया और सामाजिक समीकरणों को साधा. इसका नतीजा 2025 के चुनाव में दिखा, जब बीजेपी ने 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया.

2026 में संजय सरावगी के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया और पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई. सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने, जबकि विजय सिन्हा उपमुख्यमंत्री नियुक्त हुए.

राजनीतिक विश्लेषकों और न्यूमरोलॉजी के जानकार इसे ‘S’ फैक्टर का असर मानते हैं, लेकिन हकीकत यह भी है कि यह सफलता सही समय पर सही नेतृत्व, मजबूत संगठन और रणनीतिक फैसलों का नतीजा है. सुशील मोदी से लेकर सम्राट चौधरी तक, इस सिलसिले ने बीजेपी को बिहार में सत्ता के शिखर तक पहुंचा दिया है.

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