नालंदा, जो कभी दुनिया के ज्ञान का केंद्र रहा, आज अपनी एक अनोखी सामाजिक विरासत के धीरे-धीरे खत्म होने का गवाह बन रहा है. अस्थावां, हरगावां, डुमरावां, उगावां, चकदीन, देसना और गिलानी जैसे सात गांवों में कभी लोगों की पहचान जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उनके गांव के नाम से होती थी. लोग गर्व से अपने नाम के आगे ‘अस्थानवी’, ‘हरगानवी’, ‘डुमरानवी’, ‘उगानवी’, ‘चकदीनवी’, ‘देसनवी’ और ‘गिलानी’ जैसे सरनेम लगाते थे. यह परंपरा सिर्फ बोलचाल तक सीमित नहीं थी, बल्कि सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज होती थी.
करीब 50 हजार की आबादी वाले इस क्षेत्र में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग एक साझा पहचान के साथ रहते थे. यह गंगा-जमुनी तहजीब की एक मजबूत मिसाल थी, जिसकी गूंज देश ही नहीं, विदेशों तक सुनाई देती थी. हालांकि आज बदलते समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है.
इन गांवों में ‘मोहिउद्दीनपुर गिलानी’ आज भी इस विरासत को संजोए हुए है. यहां के कई हिंदू परिवार भी अपने नाम के साथ ‘गिलानी’ लगाते हैं और इसे गर्व की बात मानते हैं. स्थानीय निवासी बताते हैं कि विदेशों में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी यह पहचान कभी नहीं छोड़ी.
नालंदा के देसना गांव की ऐतिहासिक लाइब्रेरी भी इस विरासत का प्रतीक रही है, जहां देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अध्ययन किया था. उस दौर में विद्वानों की पहचान ‘देसनवी’ से होती थी.
लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे आधुनिकता, पलायन और बदलता सामाजिक माहौल प्रमुख कारण हैं. नई पीढ़ी अपने नाम के साथ गांव का नाम जोड़ने को पुराना मानने लगी है.
कभी जो लोग गर्व से अपनी पहचान गांव के नाम से बताते थे, आज उनके वंशज इस परंपरा से अनजान होते जा रहे हैं. यह सिर्फ एक सरनेम का अंत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत की खामोश विदाई है.
