दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 से 23 अगस्त तक बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के लोगों ने UGC की नई गाइडलाइंस के खिलाफ प्रदर्शन किया। इन गाइडलाइंस को केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 13 जनवरी 2026 को लागू किया था। हालांकि 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन पर रोक लगाते हुए 2012 के नियमों को जारी रखने का निर्देश दिया था।
विवाद की जड़ UGC की ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस’ गाइडलाइंस हैं। इनमें उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियां बनाने और जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान किया गया। विरोध करने वालों का आरोप है कि समिति की संरचना में SC, ST और OBC वर्ग को विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया, जबकि सामान्य वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। उनका कहना है कि इससे शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका पैदा होती है।
दरअसल, यह विरोध सिर्फ UGC गाइडलाइंस तक सीमित नहीं है। आरक्षण, प्रमोशन में आरक्षण और SC-ST एक्ट जैसे मुद्दे भी अब बहस के केंद्र में आ गए हैं।
आरक्षण का पुराना विवाद:
1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इसके बाद देशभर में व्यापक विरोध हुआ और आरक्षण की सीमा को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। बाद में प्रमोशन में आरक्षण और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण जैसे प्रावधान भी लागू हुए। 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लागू किया गया।
अब सामान्य वर्ग का एक हिस्सा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, आर्थिक आधार पर अवसर और नीतियों में निष्पक्षता की मांग कर रहा है। उनका आरोप है कि आरक्षण का लाभ कुछ वर्गों तक सीमित रह गया है, जबकि जरूरतमंद लोग पीछे छूट रहे हैं।
हालांकि सरकार और आरक्षण समर्थक वर्गों का तर्क है कि आरक्षण सामाजिक और ऐतिहासिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है।
ऐसे में UGC गाइडलाइंस का विवाद क्या लंबे समय से दबे असंतोष का नया केंद्र बन गया है? क्या इससे सामान्य वर्ग की राजनीतिक लामबंदी बढ़ेगी? इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों की राजनीति और न्यायिक फैसलों से ही साफ होगा।








