बिहार के शिवहर जिले के तरियानी प्रखंड स्थित हिरौता दुम्मा गांव का उप स्वास्थ्य केंद्र आज बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जिसे देखकर लोग इसे ‘भूतिया अस्पताल’ कहने लगे हैं। चारों ओर घना जंगल, दीवारों पर उगे पीपल के पेड़, टूटी खिड़कियां और अंधेरे कमरों वाला यह अस्पताल किसी हॉरर फिल्म के सेट जैसा दिखता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि शाम ढलने के बाद यहां आने से डर लगता है, क्योंकि सांप-बिच्छू जैसे जहरीले जीवों का खतरा हमेशा बना रहता है।
1984 में इस अस्पताल की स्थापना गांव के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के उद्देश्य से की गई थी। इसके लिए स्थानीय परिवार ने 22 डिसमिल जमीन दान दी थी, लेकिन चार दशक बाद भी अस्पताल की हालत नहीं बदली। भवन अब खंडहर में तब्दील हो चुका है और परिसर में जंगल-झाड़ियां फैल गई हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तक नहीं है। मरीजों को खेतों और पगडंडियों के रास्ते अस्पताल लाना पड़ता है। बिजली के खंभे और मीटर लगे हैं, लेकिन अस्पताल में रोशनी नहीं होती। पेयजल के लिए लगा चापाकल भी वर्षों से खराब पड़ा है।
स्थानीय निवासी सुरेश प्रसाद साह कहते हैं कि कई बार अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं युवा पवन कुमार का कहना है कि बचपन से अस्पताल की यही स्थिति देख रहे हैं और आज भी यहां डॉक्टर समय पर नहीं आते।
ग्रामीणों ने प्रशासन से पांच प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें पक्की सड़क, साफ-सफाई, पेयजल, नियमित बिजली और 24 घंटे डॉक्टरों की तैनाती शामिल है।
इस मामले पर शिवहर के सिविल सर्जन डॉ. दीपक कुमार ने कहा है कि अस्पताल का निरीक्षण किया गया है और जल्द ही व्यवस्था सुधारने का प्रयास किया जाएगा।
