बिहार के वैशाली जिले में चुनाव के बाद एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या युवा यादव की किशोरावस्था में गलत उम्मीदवार का चयन हुआ? इस सवाल को और टैब में मिला जब विपक्ष के चार विधायक वोट से नदारद रहे, जिसमें वाल्मिकीनगर से कांग्रेस नेता बल सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा भी शामिल हैं।
सुरन्द्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया के माध्यम से फ़्रांसीसी अपनी नैपकिन स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि ब्लूटूथ के पास एक सीट का सुनहरा अवसर था, लेकिन अभ्यर्थी चयन में असफल हो गए। उनके अनुसार, दीपक यादव या मुकेश साहनी जैसे नेताओं को उम्मीदवार बनाया गया तो बेहतर परिणाम मिल सकते थे। उन्होंने यह भी कहा कि जिस व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया गया था, वह अपने जनाधार समर्थक के पक्ष में नहीं था, इसलिए उन्होंने वोट नहीं दिया।
अपने ऊपर लगाए गए सुझावों पर सफाई देते हुए कुशवाहा ने कहा कि उन्होंने चुनाव में जनता के बल की जीत हासिल की है और विकास के जरिए जनता का विश्वास बढ़ाया है। उन्होंने उन्हें बदनाम करने का आरोप भी लगाया।
16 मार्च को बिहार में सचिवालय के 5 सीटों के लिए मतदान हुआ। प्रोटोटाइप ने सभी पाँच रेज़्यूमे पर जीत दर्ज की, जबकि फ़्रांसीसी एक भी सीट नहीं जीत सका। आंकड़ों के मुताबिक, एक सीट के लिए 41 सवालों की जरूरत थी। समर्थकों ने AIMIM और समाजवादी पार्टी के समर्थकों की संख्या पूरी कर ली थी, लेकिन वोट के दौरान चार ऑर्केस्ट्रा की गैरमौजूदगी में भारी गिरावट आई।
बहुधा राजद के दावेदार अमरेन्द्र धारी सिंह को हार का सामना करना पड़ा। दूसरी नोटबुक के साथ भाजपा के शिवेश राम सफल हो रहे हैं। इस संपूर्ण घटनाक्रम में सिस्टम की रणनीति और एकजुटता दोनों पर प्रश्न नीचे दिए गए हैं।
