बदलाव समय की सबसे बड़ी सच्चाई है, और यह सच्चाई बिहार की राजनीति में भी कई बार दिखाई दी है। आज़ादी के बाद से लेकर 1985-90 के दशक तक बिहार की राजनीति पर दिल्ली का सीधा प्रभाव देखने को मिलता था। उस दौर में यह आम धारणा थी कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला पटना से ज्यादा दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में होता था। बिहार की सत्ता की चाबी मानो दिल्ली के दरबार के पास ही रहती थी।

 

लेकिन 1990 के दशक में बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव के उदय के साथ सत्ता का समीकरण बदलने लगा। लालू प्रसाद यादव ने न सिर्फ बिहार की राजनीति को नए तरीके से परिभाषित किया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। उनके जनाधार और राजनीतिक प्रभाव ने कई बार केंद्र की राजनीति और गठबंधन सरकारों की दिशा तय करने में भूमिका निभाई। उस दौर में ऐसा लगने लगा कि अब बिहार भी दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करने की ताकत रखता है।

 

इसके बाद बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दौर आया। उन्होंने अपनी राजनीतिक रणनीति, गठबंधन की राजनीति और समय-समय पर लिए गए फैसलों से राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाई। कई मौकों पर केंद्र की सरकारों के गठन और राजनीतिक समीकरणों में नीतीश कुमार का नाम एक महत्वपूर्ण फैक्टर के रूप में सामने आया।

 

हालांकि समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां फिर बदलती नजर आ रही हैं। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बिहार की सत्ता की दिशा तय करने में एक बार फिर दिल्ली का प्रभाव बढ़ रहा है। राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं और सत्ता की धुरी फिर से दिल्ली की ओर झुकती दिखाई दे रही है।

 

राजनीति का यही स्वभाव है—यह स्थिर नहीं रहती। कभी दिल्ली से बिहार की सत्ता तय होती है, तो कभी बिहार दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करता है। इतिहास गवाह है कि सत्ता का संतुलन समय के साथ बदलता रहता है, और यही बदलाव राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई है।

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