पटना: बिहार सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती विकास और लोककल्याणकारी योजनाओं के बीच वित्तीय संतुलन बनाने की है। 2026-27 के लिए राज्य ने 3.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बजट पेश किया है। लेकिन सवाल है कि इस बड़े बजट के लिए पैसा आएगा कहां से?
बिहार की अपनी कमाई अभी भी सीमित है। 2026-27 में राज्य को करीब 75,203 करोड़ रुपये का अपना राजस्व मिलने का अनुमान है। वहीं केंद्र से टैक्स में हिस्सेदारी के तौर पर करीब 1.58 लाख करोड़ रुपये और अनुदान के रूप में करीब 51,896 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है। यानी बिहार की वित्तीय व्यवस्था काफी हद तक केंद्र से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर है।
दूसरी तरफ सरकार का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। शिक्षा के लिए 68,217 करोड़, ग्रामीण विकास के लिए 23,701 करोड़, स्वास्थ्य के लिए 21,270 करोड़, गृह विभाग के लिए 20,133 करोड़ और ऊर्जा के लिए करीब 18,737 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
पिछले दो दशकों में बिहार की प्रति व्यक्ति आय में बड़ा सुधार हुआ है। 2004-05 में यह करीब 5,780 रुपये थी, जो 2024-25 में बढ़कर 76,490 रुपये हो गई। मानव विकास सूचकांक में भी सुधार हुआ है। लेकिन गरीबी, पलायन और औद्योगीकरण की कमी अब भी बड़ी चुनौती हैं।
इसी बीच राज्य पर कर्ज का बोझ भी बढ़ रहा है। 2024-25 में बिहार पर करीब 3.74 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बताया गया है। 2026-27 में सरकार ने करीब 72,901 करोड़ रुपये की नई उधारी का प्रावधान किया है।
सरकार के सामने मुफ्त बिजली, महिलाओं को आर्थिक सहायता, बढ़ी सामाजिक सुरक्षा पेंशन और रोजगार जैसे चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत होगी।
बिहार का राजकोषीय घाटा 2026-27 में 39,112 करोड़ रुपये, यानी GSDP का करीब 2.99 प्रतिशत रहने का लक्ष्य रखा गया है। फिलहाल यह तय सीमा के भीतर है, लेकिन चुनावी वादों का पूरा वित्तीय असर सामने आने के बाद तस्वीर बदल सकती है।
यानी बिहार की असली परीक्षा सिर्फ बजट बढ़ाने की नहीं, बल्कि अपनी कमाई बढ़ाने, उद्योग और रोजगार पैदा करने और कर्ज को नियंत्रित रखने की है।





