धनबाद स्थित आईआईटी (आईएसएम) ने शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ‘फोर लोब्ड स्वर्ल इंड्यूसिंग पाइप’ तकनीक को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से भारतीय पेटेंट प्रदान किया गया है। यह नई तकनीक स्लरी और द्रव परिवहन के दौरान आने वाली तकनीकी चुनौतियों को दूर करने में सहायक होगी तथा कोयला, तेल एवं गैस, रासायनिक उद्योग, खनन, ताप विद्युत परियोजनाओं और जल आपूर्ति जैसे कई क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाने के साथ ऊर्जा की बचत भी करेगी।
यह तकनीक आईआईटी (आईएसएम) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. अजीत कुमार, डॉ. पंकज कुमार गुप्ता, डॉ. राम कृष्ण राठौर और डॉ. निरंजन कुमार की शोध टीम ने लगभग चार वर्षों के गहन अनुसंधान के बाद विकसित की है। शोधकर्ताओं के अनुसार, पारंपरिक पाइपलाइनों में स्लरी और द्रव परिवहन के दौरान ठोस कणों का जमाव, अधिक दबाव हानि और ऊर्जा की अधिक खपत जैसी समस्याएं सामने आती हैं। नई तकनीक में पाइप के भीतर द्रव नियंत्रित रूप से घूमता है, जिससे ठोस कण समान रूप से वितरित रहते हैं और प्रवाह अधिक प्रभावी बनता है। इससे ऊर्जा की खपत कम होने के साथ पाइपलाइन की कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
इस तकनीक के लिए वर्ष 2022 में पेटेंट आवेदन किया गया था। विस्तृत तकनीकी परीक्षण और समीक्षा के बाद 27 जुलाई 2026 को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने इसे भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत स्वीकृति प्रदान की। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पेटेंट उद्योगों के साथ तकनीकी सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यवसायीकरण के नए अवसर खोलेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक लौह अयस्क एवं खनिज स्लरी परिवहन, तेल एवं गैस पाइपलाइन, रासायनिक संयंत्र, ताप विद्युत परियोजनाओं, अपशिष्ट जल शोधन, हीट एक्सचेंजर और पर्यावरण अभियांत्रिकी जैसे कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित होगी। आईआईटी (आईएसएम) की यह उपलब्धि भारतीय उद्योगों में तकनीकी नवाचार, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
— संवाददाता: राजेश कुमार








