नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड में बिहारशरीफ से करीब 32 किलोमीटर दूर स्थित चंडी मौ गांव अपनी ऐतिहासिक विरासत और जमीन से निकलने वाले प्राचीन अवशेषों के कारण चर्चा में है। 644 एकड़ में फैले इस गांव के खेतों में जुताई या बारिश के बाद अक्सर मूंगा, नीलम, स्फटिक जैसे रत्न और प्राचीन मूर्तियां मिलने का दावा किया जाता है। कई ग्रामीण इन दुर्लभ वस्तुओं को वर्षों से संभालकर रखे हुए हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भगवान बुद्ध राजगीर से पावापुरी जाते समय यहां एक सप्ताह तक ठहरे थे। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित आम्रवन को भी इसी क्षेत्र से जोड़ा जाता है। गांव में 16 ताल-तलैयों और प्राचीन कुओं का उल्लेख मिलता है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।
वर्ष 1999-2000 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराई गई खुदाई में भगवान बुद्ध की लगभग 7 फीट ऊंची प्रतिमा, विष्णु, वराह अवतार, शिवलिंग और बौद्ध देवी तारा की कई मूर्तियां मिली थीं। उस समय गांव में संग्रहालय बनाने की घोषणा भी हुई थी, लेकिन आज तक यह योजना पूरी नहीं हो सकी। खुदाई में मिले अधिकांश अवशेष बाद में संग्रहालयों में भेज दिए गए।
ग्रामीणों का कहना है कि आज भी कई घरों और मंदिरों में खुदाई से प्राप्त मूर्तियां और प्राचीन ईंटें सुरक्षित रखी गई हैं। कुछ लोगों के अनुसार यहां मिले रत्नों की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। वहीं, पुरातत्व और इतिहास के जानकार चंडी मौ को महाभारत काल और बौद्ध काल से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल मानते हैं।
गांव से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार माता चंडी ने चंड और मून नामक राक्षसों का यहीं पर वध या बंदीकरण किया था। गांव में सूर्य भगवान की एक प्राचीन प्रतिमा भी मौजूद है, जिसे स्थानीय लोग विशेष महत्व देते हैं।
करीब 5 हजार आबादी वाले इस गांव के लोग अब दोबारा वैज्ञानिक खुदाई, ऐतिहासिक अवशेषों के संरक्षण और संग्रहालय निर्माण की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि चंडी मौ को बौद्ध और सनातन पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए, तो यह बिहार का एक प्रमुख पर्यटन और शोध केंद्र बन सकता है।






