बिहार की तीन पारंपरिक कलाओं को जीआई टैग, कारीगरों में खुशी की लहर

बिहार की सांस्कृतिक विरासत को बड़ी पहचान मिली है। गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला, नालंदा की बावन बूटी साड़ी और भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि से इन पारंपरिक कलाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान मिलेगी, साथ ही कारीगरों को बेहतर कीमत और रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।

गया जिले की प्रसिद्ध पत्थरकट्टी कला करीब 300 वर्ष पुरानी है। इस कला में काले ग्रेनाइट पत्थर को तराशकर भगवान बुद्ध, महावीर, देवी-देवताओं और अन्य कलात्मक प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है। माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर के पुनर्निर्माण में भी पत्थरकट्टी के शिल्पकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। स्थानीय कलाकारों का कहना है कि जीआई टैग मिलने से उनकी कला को वैश्विक पहचान मिलेगी और इसका अलग ब्रांड स्थापित होगा। यहां बनी मूर्तियां 20 रुपये से लेकर 25 लाख रुपये तक में बिकती हैं और विदेशों तक निर्यात की जाती हैं।

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वहीं नालंदा की ऐतिहासिक बावन बूटी साड़ी और फैब्रिक को भी जीआई टैग मिला है। यह अनोखी हथकरघा कला बसवन बिगहा गांव से जुड़ी है, जिसमें कपड़े पर 52 पारंपरिक बौद्ध और सांस्कृतिक प्रतीकों की बुनाई की जाती है। कभी राष्ट्रपति भवन तक इसकी मांग थी, लेकिन कोरोना काल के बाद कामकाज प्रभावित हुआ। बुनकरों को उम्मीद है कि जीआई टैग मिलने से नकल पर रोक लगेगी और असली उत्पादों को उचित मूल्य मिलेगा।

इधर भोजपुर और भोजपुरी क्षेत्र की प्रसिद्ध लोक कला पीड़िया पेंटिंग को भी जीआई टैग से सम्मानित किया गया है। यह कला मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा पारंपरिक पर्व-त्योहारों और मांगलिक अवसरों पर बनाई जाती है। प्राकृतिक रंगों और लोक प्रतीकों के माध्यम से ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं को चित्रित करने वाली इस कला को अब कानूनी संरक्षण और वैश्विक पहचान मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों कलाओं को जीआई टैग मिलने से बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को नया आयाम मिलेगा और हजारों कारीगरों के जीवन में आर्थिक बदलाव की नई उम्मीद जगेगी।

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