मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर से सामाजिक सौहार्द और महिला सशक्तिकरण की एक खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। कुढ़नी प्रखंड के बड़ा सुमेरा पंचायत स्थित मुर्गियाचक गांव में करीब 80 मुस्लिम परिवारों की जिंदगी भगवान कृष्ण की बांसुरी के कारोबार से चल रही है। जन्माष्टमी के मौके पर यहां बांसुरी बनाने का काम तेज हो गया है।
गांव के कई घरों में इन दिनों सुबह से ही बांसुरी बनाने की आवाज सुनाई देती है। घर के एक कोने में नरकट के टुकड़े रखे हैं और महिलाएं उन्हें बांसुरी का आकार देने में जुटी हैं। कोई नरकट में सुर के लिए छेद कर रहा है तो कोई तैयार बांसुरी को अंतिम रूप दे रहा है। वहीं, परिवार के पुरुष सदस्य तैयार बांसुरी लेकर बाजार और मेलों में बेचने के लिए निकलते हैं।
चार पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर
मुर्गियाचक गांव में बांसुरी बनाना कोई नया रोजगार नहीं है। कई परिवारों में यह हुनर चार पीढ़ियों से चला आ रहा है। बुजुर्ग कारीगर नूर अहमद बताते हैं कि उन्होंने बांसुरी बनाना अपने पिता से सीखा था। उस समय रोजगार के साधन सीमित थे, इसलिए बांसुरी बनाकर परिवार का भरण-पोषण शुरू किया। आज नई पीढ़ी के साथ परिवार की महिलाएं भी इस काम में सक्रिय रूप से जुड़ गई हैं।
10 हजार की मदद बनी कारोबार का सहारा
महिला कारीगर अख्तरी खातून बताती हैं कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत मिली 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता से उन्होंने कारोबार के लिए कच्चा माल खरीदा। पहले पूंजी की कमी के कारण जरूरत के मुताबिक सामान खरीदना मुश्किल होता था। अब सरकारी मदद को कारोबार में लगाकर काम को आगे बढ़ाया जा रहा है।
गांव में तैयार होने वाली बांसुरी बिहार के अलग-अलग जिलों के साथ झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल और भूटान तक पहुंचती है। परिवार बांसुरी के अलावा खिलौने और पंखे भी बनाते हैं।
सबसे खास बात यह है कि अब इस पारंपरिक कारोबार में सास और बहू तक साथ मिलकर काम कर रही हैं। जन्माष्टमी के मौसम में बढ़ती मांग ने इन परिवारों के रोजगार को नई रफ्तार दी है। यहां बांसुरी सिर्फ भगवान कृष्ण की पहचान नहीं, बल्कि इन परिवारों की रोजी-रोटी, हुनर और आत्मनिर्भरता की धुन भी बन चुकी है।






