रक्षाबंधन के अवसर पर पूर्व सांसद आनंद मोहन ने देशवासियों और भाइयों को शुभकामनाएं देते हुए आरक्षण व्यवस्था, सामाजिक न्याय और छात्रों के आंदोलनों को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक व्यवस्था और परंपरा बेहद समृद्ध रही है। महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया और पंचायती राज संस्थाओं में भी महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया गया।
आरक्षण के मुद्दे पर आनंद मोहन ने कहा कि वे आरक्षण हटाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन समय के साथ इसकी समीक्षा जरूर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का उद्देश्य उन वर्गों को विशेष अवसर देना था, जो सदियों से सामाजिक रूप से पिछड़े और दबे रहे हैं, ताकि वे मुख्यधारा में आकर देश की प्रगति में भागीदार बन सकें।
उन्होंने कहा कि आज भी आरक्षण का लाभ सभी जरूरतमंद जातियों और वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। विशेष रूप से पिछड़े वर्गों के भीतर भी कई जातियां ऐसी हैं, जिन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। इसलिए आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का विषय गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
यूजीसी और आरक्षण को लेकर चल रही बहस पर उन्होंने कहा कि लोगों को सामाजिक परिस्थितियों को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि किसी भी मुद्दे पर भावनाओं में आकर प्रतिक्रिया देने के बजाय ठंडे मन से विचार करना चाहिए।
छात्र आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं में आक्रोश है। बिहार, झारखंड, राजस्थान समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए वर्षों तक मेहनत और पैसा खर्च करते हैं। ऐसे में उनकी परेशानियों को समझना सरकार और व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
आनंद मोहन ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन आंदोलन हिंसक नहीं होना चाहिए। उन्होंने गांधी, जयप्रकाश नारायण और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक विरोध में अनुशासन और संयम जरूरी है। उन्होंने अपील की कि पुलिस और प्रशासन के साथ टकराव के बजाय शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखी जाएं।








